प्रेरणादायक कहानियों का संग्रह!_collection of inspirational stories

कहानी का शीर्षक :- ईमानदार

एक धनी सेठ था, जिसके पास सुख-सुविधा की हर वस्तु उपलब्ध थी। उसकी एक विशाल पुश्तैनी हवेली थी, जिसकी सफाई करवानी थी। लेकिन सेठ पूरे घर की सफाई एक साथ नहीं करवाना चाहता था, क्योंकि ऐसा करने से सारा सामान इधर-उधर करना पड़ता और समय व मेहनत दोनों अधिक लगते।

सेठ ने ऐसे मजदूर की तलाश की, जो हर दिन केवल एक कमरा साफ करे। उसने कई मजदूरों से बात की, लेकिन सबने पूरे घर की सफाई एक साथ करने पर जोर दिया। अंत में, सेठ ने एक 12-13 साल के लड़के, अतुल, को काम पर रखा। अतुल रोज समय पर आता और एक-एक करके कमरों की सफाई करता।

अतुल ने कुछ ही दिनों में बाहरी कमरों की सफाई पूरी कर दी। इस दौरान उसने कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया। उसके अच्छे आचरण और मेहनत ने घर के सभी सदस्यों का विश्वास जीत लिया। अब वह घर के आंतरिक कमरों की सफाई करने लगा।

एक दिन, जब वह सेठ के शयनकक्ष की सफाई करने गया, तो वहां रखी कीमती वस्तुओं को देखकर उसकी आंखें चौंधिया गईं। कमरे में रखी सुंदर वस्तुएं, जिनमें से कुछ सोने और चांदी से जड़ी हुई थीं, उसे बेहद आकर्षित कर रही थीं।

अतुल का ध्यान विशेष रूप से एक सोने की घड़ी पर जा टिका। उसका बाल-मन उस घड़ी की ओर खिंचने लगा। उसने घड़ी को कई बार उठाकर देखा, कान से लगाकर उसकी टिक-टिक सुनी, और अपनी कलाई पर बांधकर देखा। लेकिन जैसे ही उसके मन में यह विचार आया कि वह इसे चुरा सकता है, उसका शरीर कांपने लगा।

उसे अपनी मां की सीख याद आई, जिसमें उन्होंने कहा था, "बेटा, चोरी करना महापाप है। चाहे तुम्हें भूखा क्यों न रहना पड़े, पर चोरी मत करना। ईश्वर हर चीज देखता है और चोरी का पाप कभी छिपता नहीं।"

अतुल घड़ी को मेज पर रखकर रोने लगा और घबराते हुए बाहर भाग गया। वह चिल्लाता जा रहा था, "मां, मैं चोर नहीं हूं। मुझे बचा लो, मैं जेल नहीं जाऊंगा।"

यह सब घर की मालकिन ने देखा। उन्होंने अतुल को गले से लगाकर शांत कराया और कहा, "बेटा, तुमने कोई चोरी नहीं की। तुम तो बहुत ईमानदार हो।" मालकिन ने घड़ी उसे देनी चाही, लेकिन अतुल ने लेने से इनकार कर दिया।

मालकिन अतुल की ईमानदारी से प्रभावित हुईं और उसकी मां से मिलने उसके घर पहुंचीं। उन्होंने अतुल की मां से कहा, "आपने अपने बेटे को सच्चाई और नैतिकता का जो पाठ पढ़ाया है, वह सराहनीय है। मैं आपके बेटे की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाऊंगी।"

अतुल आगे चलकर बंगाल का महापुरुष बना और देश का गौरव बना।

शिक्षा: यह कहानी हमें सिखाती है कि नैतिकता और ईमानदारी जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति हैं। सही संस्कार और शिक्षा बच्चों को सही राह दिखाते हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों में नैतिक मूल्यों के बीज बचपन से ही बोएं, ताकि वे जीवनभर अच्छे नागरिक बन सकें। उचित आचरण और सच्चाई ही व्यक्ति को महान बनाते हैं।

कहानी का शीर्षक :- ईमानदार


सुबह का माहौल हमेशा की तरह व्यस्त था। घर की दीवारें हलचल से गूंज रही थीं। वह, अपने छोटे से बच्चे को सुलाकर, आज पहली बार बुटीक जाने की तैयारी में थी।

"सुनो! मैं बुटीक होकर आती हूं," उसने दरवाजे से झांकते हुए कहा।
"हां, ठीक है," पति ने जवाब दिया। वह अपने लैपटॉप पर झुका हुआ था, म्यूजिक सुनते हुए ऑफिस के काम में डूबा था।

उसने किचन की ओर रुख किया। दूध की बोतल प्लेटफार्म पर रखी और जल्दी से कहा, "बाबू सो रहा है। अगर रोए तो दूध की बोतल दे देना।"
पति ने कान में लगे हेडफोन के साथ बस सिर हिला दिया, जैसे उसकी बात सुनी हो।

ऑनलाइन बुक किया गया ऑटो नीचे खड़ा इंतजार कर रहा था। वह जल्दी-जल्दी लिफ्ट में दाखिल हुई और मन ही मन खुद को शांत करने की कोशिश करने लगी। लेकिन आज पहली बार बच्चा छोड़ने का गिल्ट उसे भीतर से मथ रहा था। ऑटो में बैठते ही दर्द और बढ़ गया।

"भैया, दो मिनट रुकेंगे? लगता है कुछ छूट गया है।"
"ठीक है, मैडम। जल्दी कीजिए," ड्राइवर ने संयमित आवाज में कहा।

लिफ्ट जैसे उसके इंतजार में ही ग्राउंड फ्लोर पर रुकी हुई थी। वह अंदर गई, बटन दबाया और लिफ्ट सीधा पांचवी मंजिल की ओर बढ़ गई। जैसे ही दरवाजा खुला, बच्चे के रोने की तीखी आवाज उसके कानों में पड़ी। उसका दिल धक से रह गया।

दरवाजे को हल्के से धकेलते ही देखा कि बच्चा बेतहाशा रो रहा था। और उसका पति? कान में हेडफोन लगाए, लैपटॉप की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए, जैसे दुनिया से बेखबर हो। वह वहीं बैठा था, मानो कुछ हुआ ही न हो।

वह लगभग दौड़ती हुई बच्चे के पास गई। गोद में उठाया और सीने से चिपका लिया। उसकी छोटी-छोटी सिसकियों ने मानो मां के दिल के सारे गिल्ट को गहरी सांसों में बहा दिया। उसने प्लेटफार्म से दूध की बोतल उठाई और बैग में डाली।

इस बार वह शांत नहीं रह पाई। उसने पति के कंधे पर हाथ रखा।
"तुम तो बुटीक जा रही थी ना?"
"हां। जा रही हूं। दरवाजा बंद कर लेना," उसने धीमी पर भावुक आवाज में कहा।

पति ने इस बार हेडफोन निकाला, जैसे कुछ गलत समझ आया हो। लेकिन वह बिना कोई और बात किए लिफ्ट की ओर बढ़ गई।

लिफ्ट से नीचे उतरते वक्त उसके मन में हजारों सवाल थे। "क्या पुरुष इतने लापरवाह होते हैं?" उसका दिल गुस्से और दुख के भावों से भर गया। लेकिन दूसरे ही पल उसने खुद को संभाला। "शायद हेडफोन की वजह से उसने सुना ही न हो।"

उसने बिना एक भी शिकवा किए, अपने मन के इल्जाम को हटा दिया। उसने पति को 'बाइज्जत बरी' कर दिया।

जब वह गोद में बच्चे को लिए वापस ऑटो में बैठी, तो ड्राइवर ने मन ही मन सोचा, "कैसी मां है! बच्चे को ही भूल आई।" लेकिन उसकी मुस्कान में जो सुकून और दृढ़ता थी, वह देखकर वह कुछ कह न सका।

"चलो, भैया," उसने सहजता से कहा।

ऑटो चल पड़ी। अब उसके चेहरे पर सुकून था। उसने अपनी जिम्मेदारी और प्यार के बीच संतुलन बना लिया था।

शिक्षा: यह कहानी हमें रिश्तों में धैर्य, समझ और क्षमा के महत्व का पाठ सिखाती है। हर स्थिति में बिना पूरी बात समझे किसी पर दोषारोपण न करें। प्यार और परिवार की डोर मजबूत करने के लिए थोड़ा त्याग और भरोसा जरूरी है। जब तक हम सच्चाई को न जानें, किसी के प्रति नकारात्मक सोच रखना ठीक नहीं। रिश्तों में संतुलन ही असली सुख है।


कहानी का शीर्षक :-  दो परिवार


एक शांत बस्ती में दो परिवार एक-दूसरे के पड़ोस में रहते थे। दोनों परिवारों का जीवन बिल्कुल अलग था। पहले परिवार में हर वक्त लड़ाई-झगड़े और तनाव का माहौल रहता था, जबकि दूसरा परिवार हमेशा शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण वातावरण में रहता।

पहले परिवार की पत्नी ने अक्सर पड़ोसी परिवार को देखकर ईर्ष्या महसूस की। उसे यह समझ नहीं आता था कि आखिर वे इतना खुशहाल और शांत कैसे रहते हैं। एक दिन उसने अपने पति से कहा,
“तुम जाकर पता करो कि हमारे पड़ोसी इतने अच्छे तरीके से कैसे रहते हैं। उनकी खुशहाली का राज़ क्या है?”

पति को यह विचार सही लगा। अगले दिन उसने छिपकर पड़ोसी के घर में झांकने की योजना बनाई। वह चुपके से उनके घर के पास गया और खिड़की के पास छिपकर देखने लगा।

उसने देखा कि पड़ोसी परिवार की पत्नी फर्श पर पोछा लगा रही थी। तभी किचन से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई, और वह जल्दी-जल्दी किचन की ओर चली गई। इसी दौरान उसका पति कमरे की तरफ जाने लगा। उसका ध्यान फर्श पर रखी बाल्टी पर नहीं गया, और ठोकर लगने से बाल्टी का सारा पानी फर्श पर फैल गया।

पड़ोसी की पत्नी किचन से लौटकर आई और जैसे ही उसने पानी फैला देखा, उसने तुरंत कहा,
“आई एम सॉरी, डार्लिंग। यह मेरी गलती है। मुझे बाल्टी को रास्ते से हटा देना चाहिए था।”

पति ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“नहीं डार्लिंग, गलती मेरी है। मुझे ध्यान देना चाहिए था।”

यह सुनकर झगड़ालू परिवार का पति हैरान रह गया। उसने सोचा कि अगर यह घटना उनके घर में हुई होती, तो अब तक चीख-पुकार मच चुकी होती।

वह चुपचाप घर लौट आया। उसकी पत्नी ने उत्सुकता से पूछा,
“तो पता चला उनके खुशहाल जीवन का राज़?”

पति ने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया,
“उनमें और हममें फर्क यह है कि हम हमेशा खुद को सही साबित करने में लगे रहते हैं और दूसरे को उसकी गलती के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। जबकि वे अपनी गलती मानने के लिए तैयार रहते हैं और हर चीज़ के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेते हैं। यही उनकी खुशहाली का राज़ है।”

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी रिश्ते, खासकर परिवार में, अहंकार को साइड में रखना बेहद जरूरी है। खुशहाल रिश्ते की नींव तब मजबूत होती है, जब हम अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं और दूसरे को दोषी ठहराने से बचते हैं।

रिश्तों में "हम" का भाव रखना चाहिए, न कि "मैं" का। दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश से न केवल रिश्तों में कड़वाहट आती है, बल्कि परिवार का माहौल भी खराब होता है।

हमेशा याद रखें:

• परिवार में दूसरे की जीत भी आपकी जीत होती है।

• बहस में जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण है रिश्ते को बचाना।

• दूसरों को दोष देने की बजाय खुद जिम्मेदारी लें।

परिवार जोड़ने की कला सीखें, तो एक खुशहाल और शांतिपूर्ण जीवन संभव है।

कहानी का शीर्षक :-अभ्यास का महत्त्व


प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। वे न केवल शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करते थे, बल्कि आश्रम की देखभाल भी करते थे। यह शिक्षा जीवन को संतुलित और समग्र रूप से सिखाती थी।

इसी तरह, वरदराज भी अपने परिवार का एक सामान्य सा बच्चा था। उसे पढ़ाई में कोई खास रुचि नहीं थी, फिर भी उसे गुरुकुल भेजा गया। वह वहां अपने साथियों के साथ घुलमिल कर रहा था, लेकिन पढ़ाई में उसे कोई खास सफलता नहीं मिल रही थी।

गुरुजी ने उसे सिखाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन वरदराज के लिए कोई बात आसान नहीं थी। हर बार जब गुरुजी उसे समझाते, तो वह सिर्फ उलझन में ही पड़ता। उसके साथी, जो जल्दी सीख जाते थे, वह अगली कक्षा में चले गए, लेकिन वरदराज वहीं रुक गया।

अंत में, गुरुजी ने उसे समझाया, "बेटा वरदराज, मैंने अपनी पूरी कोशिश कर ली है, लेकिन तुम सीखने में सक्षम नहीं हो। अब तुम अपना समय यहां बर्बाद मत करो। घर जाकर अपने परिवार की मदद करो।"

वरदराज को लगा कि शायद शिक्षा उसकी किस्मत में नहीं है। उसने दुखी मन से गुरुकुल छोड़ने का फैसला किया। वह घर की ओर लौटने लगा, लेकिन रास्ते में कुछ हुआ जो उसकी सोच को बदलने वाला था।

दोपहर का समय था और उसे प्यास लग रही थी। वह पास में स्थित एक कुएं पर गया, जहां कुछ महिलाएं पानी भर रही थीं। उसने देखा कि कुएं से पानी खींचने के लिए रस्सी को बार-बार खींचने पर पत्थरों पर गहरे निशान बन गए थे। यह देखकर वरदराज ने उन महिलाओं से पूछा, "यह निशान कैसे बने?"

एक महिला मुस्कराते हुए बोली, "बेटे, ये निशान हमने नहीं बनाए। यह तो रस्सी के बार-बार खींचने से बने हैं। जब रस्सी बार-बार कठोर पत्थर से रगड़ती है, तो वह भी उस पर गहरे निशान बना देती है।"

यह सुनकर वरदराज सोच में पड़ गया। उसने मन ही मन विचार किया, "यदि एक कोमल रस्सी बार-बार रगड़ने से कठोर पत्थर पर निशान बना सकती है, तो क्या मैं भी लगातार प्रयास से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता?"

यह विचार उसके मन में गहरे रूप से बैठ गया। उसने ठान लिया कि अब वह हर हाल में प्रयास करेगा। अपनी मर्जी और मेहनत से उसने गुरुजी के पास वापस जाने का निर्णय लिया।

गुरुकुल लौटकर उसने पहले से कहीं ज्यादा मेहनत करना शुरू किया। गुरुजी ने उसकी कड़ी मेहनत देखी और उसे प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे वरदराज ने न केवल अपनी कठिनाईयों को पार किया, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में शानदार सफलता हासिल की।

कुछ सालों बाद, वही मंदबुद्धि बालक वरदराज संस्कृत व्याकरण का महान विद्वान बना। उसने लघुसिद्धान्‍तकौमुदी, मध्‍यसिद्धान्‍तकौमुदी, सारसिद्धान्‍तकौमुदी, और गीर्वाणपदमंजरी जैसी महत्वपूर्ण रचनाएं कीं। उसकी मेहनत और अभ्यास ने उसे महान बना दिया, और आज भी उसके योगदान को याद किया जाता है।

शिक्षा: दोस्तों, अभ्यास का कोई विकल्प नहीं होता। यह केवल आपके सपनों को ही नहीं, बल्कि आपके जीवन की हर मुश्किल को भी आसान बना देता है। यह हमें अपने लक्ष्य के करीब पहुंचाता है।

अगर आप बिना अभ्यास के केवल किस्मत पर भरोसा करेंगे, तो अंत में केवल पछतावा ही हाथ लगेगा। अभ्यास, धैर्य, परिश्रम और लगन के साथ अगर आप अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगे, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होगी।

याद रखिए, कठिनाइयाँ और विफलताएँ केवल हमें सीखने का अवसर देती हैं, और लगातार प्रयास से ही हम किसी भी कठिनाई को पार कर सकते हैं। जैसे रस्सी ने पत्थर पर निशान बना दिए, वैसे ही अभ्यास आपके जीवन में सफलता के निशान छोड़ सकता है।

इसलिए, आप भी निरंतर अभ्यास करते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़े और दुनिया को दिखा दें कि कठिनाइयों के बावजूद आप महानता को प्राप्त कर सकते हैं।

कहानी का शीर्षक :-अभ्यास का महत्त्व


प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। वे न केवल शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करते थे, बल्कि आश्रम की देखभाल भी करते थे। यह शिक्षा जीवन को संतुलित और समग्र रूप से सिखाती थी।

इसी तरह, वरदराज भी अपने परिवार का एक सामान्य सा बच्चा था। उसे पढ़ाई में कोई खास रुचि नहीं थी, फिर भी उसे गुरुकुल भेजा गया। वह वहां अपने साथियों के साथ घुलमिल कर रहा था, लेकिन पढ़ाई में उसे कोई खास सफलता नहीं मिल रही थी।

गुरुजी ने उसे सिखाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन वरदराज के लिए कोई बात आसान नहीं थी। हर बार जब गुरुजी उसे समझाते, तो वह सिर्फ उलझन में ही पड़ता। उसके साथी, जो जल्दी सीख जाते थे, वह अगली कक्षा में चले गए, लेकिन वरदराज वहीं रुक गया।

अंत में, गुरुजी ने उसे समझाया, "बेटा वरदराज, मैंने अपनी पूरी कोशिश कर ली है, लेकिन तुम सीखने में सक्षम नहीं हो। अब तुम अपना समय यहां बर्बाद मत करो। घर जाकर अपने परिवार की मदद करो।"

वरदराज को लगा कि शायद शिक्षा उसकी किस्मत में नहीं है। उसने दुखी मन से गुरुकुल छोड़ने का फैसला किया। वह घर की ओर लौटने लगा, लेकिन रास्ते में कुछ हुआ जो उसकी सोच को बदलने वाला था।

दोपहर का समय था और उसे प्यास लग रही थी। वह पास में स्थित एक कुएं पर गया, जहां कुछ महिलाएं पानी भर रही थीं। उसने देखा कि कुएं से पानी खींचने के लिए रस्सी को बार-बार खींचने पर पत्थरों पर गहरे निशान बन गए थे। यह देखकर वरदराज ने उन महिलाओं से पूछा, "यह निशान कैसे बने?"

एक महिला मुस्कराते हुए बोली, "बेटे, ये निशान हमने नहीं बनाए। यह तो रस्सी के बार-बार खींचने से बने हैं। जब रस्सी बार-बार कठोर पत्थर से रगड़ती है, तो वह भी उस पर गहरे निशान बना देती है।"

यह सुनकर वरदराज सोच में पड़ गया। उसने मन ही मन विचार किया, "यदि एक कोमल रस्सी बार-बार रगड़ने से कठोर पत्थर पर निशान बना सकती है, तो क्या मैं भी लगातार प्रयास से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता?"

यह विचार उसके मन में गहरे रूप से बैठ गया। उसने ठान लिया कि अब वह हर हाल में प्रयास करेगा। अपनी मर्जी और मेहनत से उसने गुरुजी के पास वापस जाने का निर्णय लिया।

गुरुकुल लौटकर उसने पहले से कहीं ज्यादा मेहनत करना शुरू किया। गुरुजी ने उसकी कड़ी मेहनत देखी और उसे प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे वरदराज ने न केवल अपनी कठिनाईयों को पार किया, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में शानदार सफलता हासिल की।

कुछ सालों बाद, वही मंदबुद्धि बालक वरदराज संस्कृत व्याकरण का महान विद्वान बना। उसने लघुसिद्धान्‍तकौमुदी, मध्‍यसिद्धान्‍तकौमुदी, सारसिद्धान्‍तकौमुदी, और गीर्वाणपदमंजरी जैसी महत्वपूर्ण रचनाएं कीं। उसकी मेहनत और अभ्यास ने उसे महान बना दिया, और आज भी उसके योगदान को याद किया जाता है।

शिक्षा: दोस्तों, अभ्यास का कोई विकल्प नहीं होता। यह केवल आपके सपनों को ही नहीं, बल्कि आपके जीवन की हर मुश्किल को भी आसान बना देता है। यह हमें अपने लक्ष्य के करीब पहुंचाता है।

अगर आप बिना अभ्यास के केवल किस्मत पर भरोसा करेंगे, तो अंत में केवल पछतावा ही हाथ लगेगा। अभ्यास, धैर्य, परिश्रम और लगन के साथ अगर आप अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगे, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होगी।

याद रखिए, कठिनाइयाँ और विफलताएँ केवल हमें सीखने का अवसर देती हैं, और लगातार प्रयास से ही हम किसी भी कठिनाई को पार कर सकते हैं। जैसे रस्सी ने पत्थर पर निशान बना दिए, वैसे ही अभ्यास आपके जीवन में सफलता के निशान छोड़ सकता है।

इसलिए, आप भी निरंतर अभ्यास करते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़े और दुनिया को दिखा दें कि कठिनाइयों के बावजूद आप महानता को प्राप्त कर सकते हैं।

कहानी का शीर्षक :-मित्रता की परिभाषा


एक समय की बात है। एक बेटे को अपने कई मित्रों पर बहुत घमंड था। उसे विश्वास था कि उसके मित्र हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहेंगे। दूसरी ओर, उसके पिता का केवल एक ही मित्र था, लेकिन वह मित्रता की सच्ची मिसाल था।

एक दिन, पिता ने बेटे से कहा, "तुम्हारे इतने सारे मित्र हैं, तो क्यों न उनकी सच्चाई की परख की जाए?" बेटा सहर्ष तैयार हो गया।

रात को लगभग 2 बजे, पिता और बेटा, बेटे के सबसे घनिष्ठ मित्र के घर पहुंचे। बेटे ने दरवाजा खटखटाया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। काफी देर तक खटखटाने के बाद, अंदर से आवाज आई। बेटे का मित्र अपनी माँ से कह रहा था, "माँ, कह दो मैं घर पर नहीं हूँ।" यह सुनकर बेटे का मन उदास हो गया। निराश होकर वह अपने पिता के साथ घर लौट आया।

घर लौटते समय पिता ने कहा, "अब तुझे मेरे मित्र से मिलवाता हूँ।" रात के उसी समय पिता अपने एकमात्र मित्र के घर पहुंचे। पिता ने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई, "दो मिनट ठहरो मित्र, मैं अभी दरवाजा खोलता हूँ।"

जब दरवाजा खुला, तो पिता का मित्र एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में तलवार लेकर खड़ा था। यह देखकर बेटे को आश्चर्य हुआ। पिता ने पूछा, "यह क्या है मित्र?"

मित्र मुस्कुराकर बोला, "मित्र, तुमने इतनी रात को मेरा दरवाजा खटखटाया है, तो जरूर किसी परेशानी में हो। मुसीबतें दो प्रकार की होती हैं - रुपये-पैसे की या किसी झगड़े की। यदि तुम्हें धन की आवश्यकता हो तो यह थैली ले जाओ, और यदि किसी से झगड़ा हो गया हो तो यह तलवार लेकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ।"

पिता की आँखें भर आईं। उन्होंने अपने मित्र से कहा, "मित्र, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो बस अपने बेटे को सच्ची मित्रता का मतलब समझा रहा था।"

उस दिन बेटे को समझ में आ गया कि मित्रता केवल संख्या का खेल नहीं है। सच्चा मित्र वही होता है, जो हर परिस्थिति में आपके साथ खड़ा रहे।

शिक्षा: मित्रता संख्या से नहीं, बल्कि गुणों से मापी जाती है। मित्र कम हों, लेकिन सच्चे और नेक हों। ऐसे मित्र चुनें जो हर समय आपके साथ खड़े रहें, न कि स्वार्थ में आपके साथ हों।

कहानी का शीर्षक:- अंधविश्वास 


एक समय की बात है, एक गुरूजी अपने कुछ शिष्यों के साथ जंगल में आश्रम बनाकर रहने लगे थे। एक दिन, रास्ता भटककर एक बिल्ली का बच्चा उनके आश्रम में आ गया। गुरूजी ने उस भूखे और प्यासे बिल्ली के बच्चे को दूध-रोटी खिलाया, और उसे आश्रम में रहने दिया। धीरे-धीरे वह बच्चा वहीं रहने लगा, लेकिन उसके आने के बाद गुरूजी को एक समस्या का सामना करना पड़ा। जब वे शाम को ध्यान करने बैठते, तो वह बच्चा कभी उनकी गोद में चढ़ जाता, कभी कंधे या सिर पर बैठ जाता। यह उन्हें ध्यान में एकाग्र होने में कठिनाई पैदा करता।

तब गुरूजी ने अपने एक शिष्य को आदेश दिया, "जब तक मैं ध्यान पर बैठूं, तुम इस बच्चे को किसी पेड़ से बांध आया करो।" यह नियम बन गया और रोज़ यही होने लगा।

कुछ समय बाद गुरूजी की मृत्यु हो गई, और उनके एक प्रिय शिष्य को उनकी गद्दी पर बिठाया गया। वही शिष्य भी जब ध्यान करने बैठता, तो पहले उस बिल्ली के बच्चे को पेड़ से बांधने की आदत रखता। फिर एक दिन एक अनहोनी घटित हो गई – वह बिल्ली मर गई। अब शिष्यों में एक बड़ी समस्या आ गई, और वे तय नहीं कर पा रहे थे कि अब क्या किया जाए। उन्होंने विचार किया और निर्णय लिया कि एक नई बिल्ली लाई जाए, क्योंकि बड़े गुरूजी भी तो यही करते थे।

काफी तलाश करने के बाद एक और बिल्ली मिली, जिसे पेड़ से बांधकर ध्यान पर बैठने का सिलसिला जारी रखा गया। यह सिलसिला इस प्रकार चलता रहा। समय के साथ, कई गुरु और कई बिल्लियाँ मर चुकी थीं, लेकिन यह परंपरा जस की तस बनी रही। अगर किसी से पूछा जाता, तो वे यही कहते कि यह परंपरा हमारे पूर्वजों ने बनाई थी और वे गलत नहीं हो सकते। इसलिए, यह परंपरा हमें भी निभानी है।

यह तो था उन गुरूजी और उनके शिष्यों का हाल, लेकिन क्या हम खुद भी अंधविश्वास और बिना सोचे-समझे परंपराओं का पालन नहीं कर रहे हैं? क्या हम अपने जीवन में ऐसी "बिल्लियाँ" नहीं पालते, जिन्हें हम बिना विचार किए हर दिन निभाते हैं?

शिक्षा: हमें अपनी परंपराओं और विश्वासों पर गहरे विचार करना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि कई बार हम बिना कारण के कुछ ऐसे अंधविश्वासों और गलत परंपराओं का पालन करते हैं जो हमारी जिंदगी में केवल भ्रम और परेशानी लाती हैं। हमें हर किसी बात या परंपरा को बिना सोचे-समझे नहीं अपनाना चाहिए। अगली बार जब हम किसी परंपरा या विश्वास को अपनाएं, तो हमें खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या यह सच में सही है या यह बस एक अनजानी "बिल्ली" का पालन करने जैसा है।

कहानी का शीर्षक:-सच्ची मित्रता 


जबलपुर के पास नर्मदा किनारे बसे रामपुर गाँव में एक संपन्न किसान और मालगुजार, ठाकुर हरिसिंह का निवास था। बचपन से ही हरिसिंह को पेड़-पौधों और प्रकृति से बेहद लगाव था। जब वे मात्र दो वर्ष के थे, तो उन्होंने अपने घर के सामने एक पौधा लगाया था। उस नन्हें पौधे को उन्होंने स्नेह और प्रेम से सींचा। सालों बीतते गए, हरिसिंह किशोर से युवा हुए, और वह पौधा भी बड़ा होकर फल देने वाला हरा-भरा वृक्ष बन गया।

गाँव में विकास कार्य के तहत सड़क निर्माण शुरू हुआ। दुर्भाग्य से, सड़क की राह में वह वृक्ष बाधा बन रहा था। इस स्थिति में दो ही विकल्प थे—या तो वह वृक्ष कट जाता, या हरिसिंह के मकान का एक हिस्सा तोड़ना पड़ता। ठाकुर हरिसिंह ने बिना एक पल सोचे वृक्ष को बचाने का निर्णय लिया और अपने घर का हिस्सा तोड़ने दिया। गाँव के लोग उनकी पर्यावरण-प्रेमी भावना से चकित थे और इस घटना की सराहना करते हुए उनके लगाव की चर्चा करने लगे।

हरिसिंह का मानना था कि पेड़ भी जीवित प्राणी होते हैं और हमारी भावनाओं को समझते हैं। यह मान्यता समय-समय पर सत्य भी सिद्ध होती थी। जब ठाकुर साहब प्रसन्न रहते, वृक्ष भी खिला-खिला प्रतीत होता। जब वे चिंतित रहते, वृक्ष मुरझाया-सा दिखाई देता।

एक दिन दोपहर में ठाकुर हरिसिंह पेड़ की छाया में आराम कर रहे थे। वहाँ की ठंडी हवाओं और शांत वातावरण में उनकी झपकी लग गई। अचानक कहीं से एक साँप आ गया और धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगा। तभी तेज़ हवा से पेड़ के कुछ फल उनकी गोद में गिरे और उनकी नींद टूट गई। जैसे ही उनकी नज़र साँप पर पड़ी, वे सचेत हो गए और अपनी जान बचाई। गाँव के लोगों का कहना था कि उस दिन वृक्ष ने हरिसिंह का कर्ज़ चुकाया था।

समय बीतता गया। हरिसिंह बूढ़े हो गए और वृक्ष भी धीरे-धीरे कमजोर और सूखने लगा। एक दिन रात्रि में ठाकुर हरिसिंह का निधन हो गया। आश्चर्यजनक रूप से अगले दिन सुबह वह वृक्ष भी जड़ से उखड़कर गिर गया। गाँव वालों ने ठान लिया कि ठाकुर साहब का अंतिम संस्कार उसी वृक्ष की लकड़ी से किया जाएगा।

गमगीन माहौल में ठाकुर हरिसिंह का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनकी और उस वृक्ष की राख को एक साथ नर्मदा में प्रवाहित कर दिया गया। ठाकुर साहब और वृक्ष के बीच की यह सच्ची मित्रता आज भी गाँववाले भावुक होकर याद करते हैं।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह समझने को मिलता है कि सच्चा प्रेम और लगाव केवल इंसानों तक सीमित नहीं होता। पेड़-पौधों, प्रकृति, और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता, स्नेह और सम्मान भी गहरी मित्रता और कृतज्ञता का आधार बन सकते हैं। हमें पर्यावरण का आदर करना चाहिए, क्योंकि प्रकृति हमें बिना शर्त बहुत कुछ देती है। इसके साथ ही, हमें यह भी समझना चाहिए कि हमारी भावनाएँ और कर्म दूसरों को भी प्रभावित करते हैं—चाहे वे जीव हों या निर्जीव।

कहानी का शीर्षक:-सही करने की प्रणाली


राजा कर्मवीर अपनी प्रजा के आलसी स्वभाव से बहुत परेशान था। उसके राज्य के लोग जिम्मेदारी निभाने से कतराते थे और सोचते थे कि हर काम राजा या राज्य के कर्मचारी ही करेंगे। राजा ने कई बार उन्हें समझाने की कोशिश की कि नागरिकों की भी अपने राज्य के प्रति कुछ जिम्मेदारी होती है, लेकिन उनकी आदतें नहीं बदलीं।

राजा ने सख्ती के कई उपाय भी किए, लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हुआ। तब उसके मंत्री ने एक उपाय सुझाया। राजा ने नगर के मुख्य चौराहे पर एक बड़ा पत्थर रखवा दिया, जिससे आधा रास्ता बंद हो गया।

अगले दिन सुबह, एक व्यापारी अपनी घोड़ागाड़ी लेकर वहां पहुंचा। जब कोचवान ने उसे रास्ते पर पड़े पत्थर के बारे में बताया, तो व्यापारी ने रास्ता बदल लिया और दूसरे रास्ते से चला गया। ऐसे ही कई लोग पत्थर देखकर रास्ता बदलते रहे, लेकिन किसी ने पत्थर हटाने की कोशिश नहीं की।

कुछ समय बाद, एक गरीब किसान वहां पहुंचा। उसने पत्थर को देखा और आसपास खेल रहे बच्चों को मदद के लिए बुलाया। बच्चों के साथ मिलकर किसान ने पत्थर को रास्ते से हटा दिया। पत्थर हटाने पर वहां एक कागज मिला, जिस पर लिखा था: "इसे राजा के पास ले जाओ।"

किसान उस कागज को लेकर राजा के पास गया। राजा ने उसकी मेहनत और जिम्मेदारी को देखकर उसे भरपूर इनाम दिया। यह बात पूरे राज्य में फैल गई। अब हर कोई ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित होने लगा, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि मेहनत का उन्हें इनाम मिलेगा। धीरे-धीरे राज्य के लोग जिम्मेदार बनने लगे और यह उनकी आदत बन गई।

समाज और अपराध पर लागू व्यवस्था: 
इसी तरह, अपराध के क्षेत्र में भी समस्या यह थी कि बड़े अपराधियों को अक्सर राजनीतिक संरक्षण मिल जाता था, जिससे उन्हें सजा नहीं मिल पाती थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चाणक्य नीति का सहारा लिया। उन्होंने प्रदेश के सबसे बड़े 100 अपराधियों की सूची बनवाई और सबसे पहले उन्हें सजा देने का अभियान शुरू किया। इस नीति का असर यह हुआ कि अपराधियों में डर फैल गया और सभी अपराधी अपने नाम को उस सूची से बचाने की कोशिश करने लगे। धीरे-धीरे अपराध और उपद्रव की घटनाएं कम होने लगीं।
कहानी से शिक्षा: कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि समाज में सुधार लाने के लिए नागरिकों की जिम्मेदारी और सक्रियता जरूरी है। जब लोगों को प्रेरित किया जाता है, तो वे जिम्मेदार बनते हैं। कठोर नीति और सही दिशा से ही समस्याओं का समाधान संभव है। सकारात्मक प्रेरणा और अनुशासन से समाज में सुधार होता है।

कहानी का शीर्षक:-साफ हृदय


बरसाना में एक भक्त थे—ब्रजदास। उनका छोटा-सा परिवार था, जिसमें बस उनकी एकमात्र बेटी रतिया थी। ब्रजदास का जीवन बड़ा ही सादा और नियमबद्ध था। वे दिन में अपना काम करते और संध्या को श्री जी के मंदिर में दर्शन करने जाते। वहां आए हुए संतों के साथ सत्संग करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।

एक दिन एक संत ने उनसे कहा, "भाई, मुझे नंदगांव जाना है। मेरे पास कुछ सामान भी है। क्या तुम मुझे वहां पहुंचा सकते हो?"

ब्रजदास ने सहर्ष स्वीकृति दे दी और अपनी बेटी रतिया से कहा, "बेटी, मुझे संत को नंदगांव छोड़ने जाना है। आने में देर हो सकती है, मेरी प्रतीक्षा मत करना।"

अगली सुबह चार बजे ब्रजदास नंगे पांव ‘राधे-राधे’ जपते हुए संत के पास पहुंचे। उन्होंने संत का सामान, ठाकुर जी की पेटी और बर्तन उठाए और नंदगांव की ओर चल दिए।

यात्रा की शुरुआत तो समय पर हुई, लेकिन संत को सांस की बीमारी थी। वे थोड़ी दूर चलते, फिर बैठ जाते। इस तरह रास्ता लंबा खिंचता गया और नंदगांव पहुंचने में देर हो गई।

नंदगांव पहुंचकर ब्रजदास ने संत से विदा मांगी, तो संत बोले, "अभी तो जून की दुपहरी है, ग्यारह बज रहे हैं। पहले जल पी लो, कुछ खा-पीकर ही जाओ।"

पर ब्रजदास ने सिर हिला दिया और बोले, "नहीं बाबा, बरसाने की वृषभानु नंदिनी नंदगांव में ब्याही हैं। मैं यहां जल ग्रहण नहीं कर सकता।"

संत उनकी श्रद्धा और निष्ठा से द्रवित हो उठे। उनकी आँखों में आंसू आ गए। वे सोचने लगे, "यह कितना गरीब आदमी है, लेकिन इसका हृदय कितना विशाल और भावनाएं कितनी पवित्र हैं!"

ब्रजदास ने संत को प्रणाम किया और ‘राधे-राधे’ का स्मरण करते हुए वापस बरसाना की ओर चल पड़े। उस समय सूर्य अपनी तीव्र गर्मी बरसा रहा था, और नीचे तपती रेत थी। भगवान को अपने भक्त की इस तपस्या पर दया आ गई, और वे स्वयं उसके पीछे-पीछे चलने लगे।

चलते-चलते ब्रजदास अत्यधिक थक गए। एक पेड़ की छाया में वे रुके, लेकिन गर्मी और थकान के कारण वहीं मूर्छित होकर गिर पड़े।

भगवान कृष्ण ने उनकी मूर्छा दूर करने की चेष्टा की, लेकिन कोई उपाय सफल नहीं हुआ। वे चिंतित हो उठे।

"मैंने अजामिल को तार दिया, गीध को मुक्ति दी, गजराज को बचाया, द्रौपदी की लाज रखी। पर यह भक्त संकट में पड़ा है और मैं कुछ कर नहीं पा रहा हूँ! इसका हृदय तो राधा रानी की भक्ति में लीन है, तो इसका उद्धार वही कर सकती हैं।"

यह सोचकर भगवान कृष्ण सीधे राधा रानी के महल पहुंचे।

राधा रानी ने भगवान को भरी दोपहरी में महल में आते देखा तो चकित हो गईं। उन्होंने पूछा, "प्रभु, इतनी गर्मी में यहां कैसे आना हुआ?"

भगवान ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, "तुम्हारे पिता जी बरसाना और नंदगांव के बीच में मूर्छित पड़े हैं। जाओ, उन्हें संभालो।"

राधा जी को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। "मेरे पिता जी?"

भगवान ने पूरी बात समझाई और कहा, "तुम्हें ब्रजदास की बेटी के रूप में वहां जाना होगा। उनके लिए जल और भोजन भी ले जाना होगा।"

राधा जी तत्काल तैयार हुईं और भोजन व जल लेकर ब्रजदास के पास पहुँचीं।

उन्होंने पुकारा, "पिता जी...! पिता जी...!"

ब्रजदास ने जब अपनी बेटी को सामने देखा, तो भाव-विह्वल हो गए। वे उसके चरणों में गिर पड़े और बोले, "बेटी, आज तू न आती तो मैं प्राण छोड़ देता!"

रतिया रूपी राधा जी ने मुस्कराकर कहा, "माँ-बाप को अपनी संतान प्रिय ही होती है। आप पहले भोजन कर लीजिए।"

ब्रजदास ने भोजन ग्रहण किया। राधा जी ने कहा, "पिता जी, घर पर कुछ मेहमान आए हैं, मैं उनकी सेवा करने जा रही हूँ। आप भोजन करके आ जाइए।"

इतना कहकर वे वहां से चल पड़ीं और थोड़ी दूरी पर अदृश्य हो गईं।

ब्रजदास को ऐसा भोजन पहले कभी नहीं मिला था। जब वे घर पहुंचे, तो खुशी और कृतज्ञता से भरे हुए थे।

उन्होंने अपनी बेटी के चरणों में गिरकर कहा, "बेटी, आज तूने भोजन और जल लाकर मेरे प्राण बचा लिए!"

रतिया चकित रह गई, "पिता जी, आप क्या कह रहे हैं? मैं तो कहीं नहीं गई!"

ब्रजदास ने चौंककर पूछा, "तो फिर मेहमान कहाँ हैं?"

रतिया बोली, "घर में कोई मेहमान नहीं आया।"

अब ब्रजदास को सब समझ आ गया।

उनकी आँखों में आँसू भर आए। वे भाव-विभोर होकर बोले, "मेरी किशोरी ने मेरे कारण इतनी प्रचंड गर्मी में कष्ट उठाया! मेरी बेटी के रूप में आकर मुझे भोजन कराया, जल पिलाया... और मैं उन्हें पहचान भी न सका!"

अब उनके मन में बस एक ही अभिलाषा थी—"फिर से श्री राधा रानी के दर्शन हों!"

शिक्षा: इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति केवल बाहरी आडंबर से नहीं होती, बल्कि हृदय की गहराइयों से निकलने वाली श्रद्धा ही सच्ची भक्ति है। ब्रजदास की निष्ठा ने स्वयं भगवान को और राधा रानी को उनकी सेवा में आने के लिए विवश कर दिया। जब प्रेम और समर्पण निश्छल होता है, तो स्वयं ईश्वर भी अपने भक्त की सहायता करने के लिए धरती पर उतर आते हैं।

बरसाना प्रेमियों का धाम है, जहाँ लोग संसार की चिंता छोड़कर केवल राधा नाम का स्मरण करते हैं। यही सच्ची भक्ति की पराकाष्ठा है—जहाँ भक्ति इतनी गहरी हो कि ईश्वर को भी भक्त का रूप धरना पड़े!

कहानी का शीर्षक:-एक धनी किसान 


एक समय की बात है, एक गांव में एक धनी किसान रहता था। उसे अपने पूर्वजों से अपार संपत्ति मिली थी, लेकिन अधिक धन-संपदा के कारण वह बेहद आलसी हो गया था। उसका अधिकांश समय हुक्का पीने और इधर-उधर बैठकर बातें करने में बीतता था। उसकी इस लापरवाही का फायदा उसके नौकर-चाकर और रिश्तेदार उठा रहे थे। नौकर अपना काम ढंग से नहीं करते थे और चोरी-छिपे सामान ले जाते थे, जबकि उसके अपने सगे-संबंधी भी उसकी संपत्ति को धीरे-धीरे हड़पने में लगे थे। किसान को इस सबकी कोई चिंता नहीं थी, क्योंकि उसे लगता था कि उसकी संपत्ति कभी खत्म नहीं होगी।

एक दिन किसान का एक पुराना मित्र उससे मिलने आया। उसने जब किसान के घर की हालत देखी तो बहुत दुखी हुआ। उसने किसान को समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। तब मित्र ने एक तरकीब निकाली और कहा कि वह उसे एक ऐसे महात्मा के पास ले जाएगा, जो अमीर बनने का रहस्य जानते हैं। किसान यह सुनकर उत्सुक हो गया और महात्मा से मिलने चला गया। महात्मा ने उसे बताया कि हर सुबह सूर्योदय से पहले एक हंस आता है, लेकिन जैसे ही कोई उसे देखने की कोशिश करता है, वह गायब हो जाता है। जो भी उस हंस को देख लेता है, उसका धन निरंतर बढ़ने लगता है।

किसान को यह बात बड़ी रोचक लगी। अगले दिन वह सूर्योदय से पहले उठकर खलिहान पहुंचा और वहां उसने देखा कि उसका एक संबंधी चुपचाप अनाज के बोरे में हाथ साफ कर रहा है। किसान ने उसे पकड़ लिया, जिससे वह शर्मिंदा होकर क्षमा मांगने लगा। फिर वह गौशाला पहुंचा, जहां उसका एक नौकर दूध चुराते हुए पकड़ा गया। किसान ने उसे डांटा और घर की सफाई करने का आदेश दिया। इस तरह वह रोज सुबह जल्दी उठकर हंस की खोज करने लगा। धीरे-धीरे नौकर और रिश्तेदार सतर्क हो गए और चोरी-चकारी बंद कर दी। नौकर ईमानदारी से काम करने लगे और घर में पहले से अधिक स्वच्छता और अनुशासन आ गया। किसान का स्वास्थ्य भी सुधरने लगा, क्योंकि अब वह हर दिन सुबह घूमने-फिरने लगा था।

धीरे-धीरे किसान को महसूस हुआ कि उसकी संपत्ति बढ़ने लगी है, लेकिन वह हंस उसे अभी तक नहीं दिखा। वह फिर महात्मा के पास गया और शिकायत की कि उसे अब तक हंस के दर्शन नहीं हुए। महात्मा मुस्कुराए और बोले, "तुम्हें हंस के दर्शन हो चुके हैं, पर तुम उसे पहचान नहीं पाए। वह हंस कोई और नहीं, बल्कि परिश्रम है। तुमने मेहनत शुरू की, अनुशासन अपनाया और अपनी जिम्मेदारी को समझा। यही सच्चा धन है, जो हमेशा बढ़ता रहेगा।" किसान को तब समझ आया कि सच्ची समृद्धि आलस्य से नहीं, बल्कि परिश्रम और जागरूकता से ही आती है।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सफलता और समृद्धि का असली रहस्य परिश्रम में छिपा होता है। अगर हम मेहनती और अनुशासित रहेंगे, तो न केवल हमारा धन बढ़ेगा, बल्कि हमारा स्वास्थ्य भी सुधरेगा और जीवन अधिक सुखमय बनेगा।

कहानी का शीर्षक:-कर्मों का खेल


एक समय की बात है, एक गरीब लकड़हारा जंगल में सूखी लकड़ियाँ खोज रहा था। उसके साथ उसका गधा भी था, जो बोझा ढोने में उसकी मदद करता था। लकड़ियाँ बटोरते-बटोरते उसे समय का बिल्कुल ध्यान नहीं रहा और दिन कब ढल गया, यह पता ही नहीं चला। जब वह संभला तो देखा कि शाम गहरा चुकी थी और वह अपने गाँव से बहुत दूर निकल आया था। तभी मौसम भी खराब होने लगा, जिससे उसकी चिंता और बढ़ गई। अब वापस लौटना संभव नहीं था, इसलिए वह जंगल में ही रात बिताने के लिए कोई सुरक्षित जगह ढूँढने लगा। तभी उसे जंगल में एक साधु की कुटिया नजर आई। खुशी-खुशी वह अपने गधे के साथ वहाँ पहुँचा और साधु से रात बिताने के लिए स्थान माँगा। साधु ने स्नेहपूर्वक उसका स्वागत किया और भोजन-पानी के साथ आराम करने की व्यवस्था भी कर दी।

लकड़हारा रात को सोने की तैयारी कर ही रहा था कि उसे एक समस्या ने घेर लिया। उसने लकड़ियों को बाँधने के लिए अपनी सारी रस्सी इस्तेमाल कर ली थी, जिससे अब उसके पास गधे को बाँधने के लिए कोई रस्सी नहीं बची थी। यह सोचकर वह चिंतित हो गया कि कहीं गधा रात में इधर-उधर भटक न जाए। उसकी परेशानी को देखकर साधु मुस्कुराए और उसे एक अनोखी युक्ति बताई। उन्होंने कहा, "तुम्हें गधे को बाँधने की जरूरत नहीं, बस उसके पैरों के पास बैठकर रोज की तरह रस्सी बाँधने का नाटक कर दो। गधा इसे सच मान लेगा और अपनी जगह से नहीं हिलेगा।" लकड़हारा पहले तो चकित हुआ, लेकिन कोई और उपाय न देखकर उसने साधु की बात मान ली और गधे को बाँधने का नाटक कर सो गया।

सुबह सूरज की पहली किरणें जंगल में फैलीं, पक्षियों की चहचहाहट शुरू हो गई और लकड़हारा नींद से जागा। उसकी पहली चिंता अपने गधे की थी। वह भागकर बाहर आया और देखा कि गधा उसी जगह खड़ा था जहाँ उसने उसे छोड़ा था। उसे बड़ी राहत मिली और वह साधु को धन्यवाद देकर गाँव लौटने के लिए तैयार हुआ। लेकिन जब उसने गधे को आगे बढ़ाने की कोशिश की तो गधा अपनी जगह से टस से मस होने को तैयार नहीं था। लकड़हारे ने उसे खूब खींचा, डाँटा-डपटा, लेकिन गधा टस से मस नहीं हुआ। यह देखकर साधु हँसे और बोले, "अरे भाई, पहले गधे को खोलो तो सही!" लकड़हारा चौंक गया और बोला, "महाराज, मैंने तो उसे बाँधा ही नहीं, फिर खोलूँ क्या?" साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, "रस्सी भले ही न बाँधी हो, लेकिन बन्धन तो डाला था। जैसे बाँधने का दिखावा किया था, वैसे ही खोलने का भी नाटक करना होगा।"

लकड़हारा चकित था, लेकिन उसने साधु की बात मानी और झूठ-मूठ रस्सी खोलने का अभिनय किया। आश्चर्य की बात यह थी कि जैसे ही उसने यह किया, गधा तुरंत चल पड़ा। लकड़हारा यह देखकर हैरान रह गया। तब साधु ने उसे समझाया, "यही कर्मों का खेल है। हम अपने कर्मों को भले ही भूल जाएँ, लेकिन उनके प्रभाव से बच नहीं सकते। हर कर्म का फल अवश्य मिलता है, और जब तक हम उसे स्वीकार कर उसके अनुसार नया कर्म नहीं करते, तब तक हम उससे मुक्त नहीं हो सकते।"

शिक्षा: यह कहानी हमें सिखाती है कि कर्म का प्रभाव गहरे तक होता है, भले ही वह प्रत्यक्ष दिखे या न दिखे। जैसे गधा अपने मानसिक बन्धन में बँध गया था, वैसे ही हम भी अपने पुराने विचारों, आदतों और कर्मों के प्रभाव में बँधे रहते हैं। जब तक हम उन बन्धनों को पहचानकर उनसे मुक्त नहीं होते, तब तक आगे नहीं बढ़ सकते। इसलिए हमें हर कर्म को सोच-समझकर करना चाहिए और अपने जीवन में बदलाव लाने के लिए सही समय पर सही निर्णय लेना चाहिए।

कहानी का शीर्षक:-कर्म और भाग्य


एक चाट वाला था, जो हमेशा ग्राहकों से घुलमिलकर बातें करता। जब भी उसके पास जाओ, तो ऐसा लगता जैसे वह हमारा ही इंतज़ार कर रहा हो। उसे हर विषय पर चर्चा करना पसंद था, चाहे राजनीति हो, समाज की बातें हों या फिर रोज़मर्रा की ज़िंदगी के मुद्दे। कई बार उससे कहा जाता कि भाई, चाट जल्दी बना दिया करो, देर हो जाती है, मगर उसकी बातचीत कभी खत्म नहीं होती। एक दिन यूँ ही बातों-बातों में कर्म और भाग्य पर चर्चा शुरू हो गई।

मुझे उसकी सोच जानने की उत्सुकता हुई, तो मैंने सीधा सवाल दाग दिया—"आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?" उसने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और बोला, "आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा?" मैंने कहा, "हाँ, है।" फिर उसने जवाब दिया, जिसने मेरे दिमाग़ के सारे भ्रम दूर कर दिए। वह बोला, "लॉकर की चाबियाँ ही इस सवाल का जवाब हैं। हर लॉकर की दो चाबियाँ होती हैं—एक आपके पास और एक बैंक मैनेजर के पास। आपकी चाबी परिश्रम है और मैनेजर की चाबी भाग्य। जब तक दोनों चाबियाँ नहीं लगतीं, तब तक ताला नहीं खुलता।"

फिर वह रुका और ज़रा गंभीर होकर बोला, "आप कर्मयोगी हैं और ऊपर वाला मैनेजर। आपको अपनी चाबी घुमाते रहनी चाहिए, यानी मेहनत करते रहनी चाहिए। कौन जाने भगवान कब अपनी चाबी लगा दे! लेकिन अगर ऊपर वाला अपनी चाबी लगा रहा हो और आपने अपनी मेहनत वाली चाबी न लगाई हो, तो ताला खुलने से रह जाएगा।" उसकी यह बात मेरे मन में गहरी उतर गई। मैंने सोचा कि कितनी साधारण, लेकिन कितनी सटीक बात कही है इस चाट वाले ने।

यह उदाहरण समझाते हुए वह फिर मुस्कुराया और बोला, "इसलिए कर्म करते रहो, क्योंकि भाग्य भरोसे बैठे रहने से कुछ नहीं मिलेगा। अगर ताला खोलना है, तो अपनी चाबी भी सही समय पर लगानी होगी।" उसकी बातों में एक गहरा संदेश था, जिसे सुनकर मैं सोचने लगा कि सच में, मेहनत और भाग्य दोनों की अपनी अहमियत है, लेकिन मेहनत हमारी अपनी चाबी है, जो हमारे हाथ में है।

शिक्षा:- कर्म करते रहिए, क्योंकि भाग्य आपकी मेहनत का ही परिणाम है। अगर आप परिश्रम नहीं करेंगे, तो भाग्य भी आपका साथ नहीं देगा। अपने सपनों को पूरा करने के लिए बस भाग्य के सहारे न रहें, बल्कि पूरी लगन से मेहनत करें। जब कर्म और भाग्य मिलेंगे, तभी सफलता का ताला खुलेगा।

कहानी का शीर्षक:- धैर्य और आत्म-मूल्य


कहानी:- एक बार एक व्यक्ति अकेला, उदास बैठा अपने जीवन की असफलताओं के बारे में सोच रहा था। वह पूरी तरह निराश हो चुका था और उसे अपनी ज़िंदगी व्यर्थ लगने लगी थी। तभी अचानक भगवान उसके समक्ष प्रकट हुए। भगवान को देखकर व्यक्ति की आँखों में आशा की एक किरण जागी। उसने भगवान से पूछा, "हे प्रभु, मुझे जीवन में बार-बार असफलता ही मिली है। मैं समझ नहीं पा रहा कि मेरी कोई कीमत भी है या नहीं। कृपया मुझे बताइए कि मेरे जीवन का क्या मूल्य है?" भगवान मुस्कुराए और उसे एक लाल रंग का चमकदार पत्थर दिया। फिर बोले, "इस पत्थर की कीमत का पता लगाओ, लेकिन ध्यान रहे, इसे बेचना मत। जब तुम इसकी वास्तविक कीमत जान लोगे, तब तुम्हें अपने जीवन का मूल्य भी समझ आ जाएगा।"

व्यक्ति पत्थर लेकर सबसे पहले एक फल वाले के पास गया और पूछा, "भाई, क्या तुम इस पत्थर को खरीदोगे? इसकी क्या कीमत होगी?" फल वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और कहा, "मुझसे दस संतरे ले जाओ और यह पत्थर मुझे दे दो।" व्यक्ति को यह सुनकर आश्चर्य हुआ, लेकिन उसने भगवान की बात को याद रखा और पत्थर बेचने से इनकार कर दिया। फिर वह एक सब्ज़ी वाले के पास गया और वही सवाल किया। सब्ज़ी वाले ने कुछ देर पत्थर को देखा और बोला, "इस पत्थर के बदले तुम मुझसे एक बोरी आलू ले सकते हो।" व्यक्ति को यह सुनकर थोड़ा अजीब लगा, लेकिन वह फिर भी चुपचाप आगे बढ़ गया।

इसके बाद वह एक सुनार की दुकान पर गया, जहाँ कई तरह के आभूषण रखे थे। सुनार ने जब वह पत्थर देखा, तो उसकी आँखें चमक उठीं। उसने बड़े ध्यान से पत्थर का निरीक्षण किया और फिर कहा, "मैं तुम्हें एक करोड़ रुपये दूंगा, यह पत्थर मुझे दे दो!" व्यक्ति यह सुनकर हैरान रह गया। उसने माफ़ी मांगी और बताया कि वह यह पत्थर नहीं बेच सकता। सुनार ने फिर कहा, "अच्छा, मैं तुम्हें दो करोड़ रुपये दूंगा, बस यह पत्थर मुझे दे दो!" व्यक्ति और भी अधिक चकित हो गया, लेकिन उसने फिर भी मना कर दिया और आगे बढ़ गया।

अंत में वह एक हीरे के व्यापारी के पास पहुँचा। व्यापारी ने जैसे ही पत्थर देखा, वह स्तब्ध रह गया। उसने पत्थर को पूरे दस मिनट तक ध्यान से परखा, फिर एक मलमल के कपड़े में लपेटकर अपने माथे से लगा लिया। फिर बोला, "यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि इस दुनिया का सबसे दुर्लभ और अनमोल रत्न है! इसे दुनिया की सारी दौलत मिलकर भी नहीं खरीदा जा सकता!" यह सुनकर व्यक्ति अवाक रह गया। वह तुरंत भगवान के पास पहुँचा और अपनी पूरी यात्रा का वर्णन किया। फिर उसने पूछा, "हे प्रभु, अब आप ही बताइए, मेरे जीवन का मूल्य क्या है?" भगवान मुस्कुराए और बोले, "फल वाले, सब्ज़ी वाले, सुनार और हीरे के व्यापारी ने तुम्हें तुम्हारे जीवन की कीमत पहले ही बता दी थी। कुछ लोग तुम्हें साधारण पत्थर समझेंगे, तो कुछ लोग तुम्हें बेशकीमती रत्न मानेंगे। मनुष्य की असली कीमत वही पहचान सकता है, जो उसका सही मूल्य समझता हो। इसलिए कभी निराश मत हो, क्योंकि हर व्यक्ति अनमोल होता है, बस उसे अपनी काबिलियत को पहचानने और निखारने के लिए धैर्य और परिश्रम की आवश्यकता होती है।"

शिक्षा:- इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमारी असली कीमत हमेशा हर किसी को समझ नहीं आती। कुछ लोग हमें कम आँकते हैं, जबकि कुछ हमें अत्यंत मूल्यवान समझते हैं। जीवन में धैर्य और मेहनत से हम अपनी वास्तविक काबिलियत को पहचान सकते हैं और उस व्यक्ति तक पहुँच सकते हैं जो हमें सही मूल्य देगा। इसलिए कभी निराश न हों और अपने गुणों को निखारने का निरंतर प्रयास करें।

कहानी का शीर्षक:-सच्चाई की जीत


मायापुर नाम का एक सुंदर गाँव था, जिसके किनारे एक घना जंगल फैला हुआ था। जंगल में तरह-तरह के पशु-पक्षी रहते थे, और अक्सर लोग लकड़ियाँ काटने वहाँ जाया करते थे। उन्हीं में से एक था रामदीन, जो ईमानदार और परिश्रमी लकड़हारा था। एक दिन जब वह जंगल से लकड़ियाँ लेकर अपने गाँव लौट रहा था, तभी अचानक सामने से एक विशाल शेर आ गया। शेर की आँखों में भयंकर भूख झलक रही थी। वह गरजते हुए बोला, "आज सुबह से मुझे कोई शिकार नहीं मिला है। मैं बहुत भूखा हूँ और अब तुम्हें ही खाकर अपनी भूख मिटाऊँगा!"

रामदीन का दिल तेजी से धड़कने लगा, परंतु उसने हिम्मत जुटाकर कहा, "मुझे मारकर अगर तुम्हारी भूख मिटती है, तो यह मेरा सौभाग्य होगा। परंतु मेरी एक विनती सुन लो। मेरे घर पर मेरी पत्नी और छोटे-छोटे बच्चे भूखे मेरा इंतजार कर रहे हैं। मैं यह लकड़ियाँ बेचकर उनके लिए भोजन ले जाऊँगा और उन्हें खिलाने के बाद तुम्हारे पास लौट आऊँगा। मैं अपना वचन नहीं तोडूँगा।" शेर ने ठहाका लगाते हुए कहा, "मैं मूर्ख नहीं हूँ कि तुम्हारी बातों में आ जाऊँ। एक बार गए तो फिर लौटकर कभी नहीं आओगे।" रामदीन की आँखों में आँसू आ गए। उसने करुणा भरी आवाज़ में कहा, "मैं झूठ नहीं बोलता। ईश्वर साक्षी है, मैं अपना वादा पूरा करूँगा।" शेर को उसकी सच्चाई पर भरोसा हो गया और उसने सूर्यास्त तक लौटने की अनुमति दे दी।

रामदीन गाँव पहुँचा और जल्दी-जल्दी लकड़ियाँ बेचकर घर के लिए भोजन लेकर गया। पत्नी ने जब उसे जल्दी करते देखा तो कारण पूछा। रामदीन ने पूरी बात बताई तो घरवाले रोने लगे और उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने कहा, "एक बार जो वचन दे दिया, उसे निभाना ही होगा। सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं।" वह परिवार को खाना देकर, अपने बच्चों को गले लगाकर, फिर से जंगल की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे कई लोगों ने रोका, पर वह अपने संकल्प पर अडिग रहा।

शेर ने सोचा था कि लकड़हारा डरकर नहीं आएगा, लेकिन जब उसने रामदीन को सचमुच वापस आते देखा, तो वह हैरान रह गया। उसकी आँखों में सम्मान झलकने लगा। उसने गर्व से कहा, "तुम जैसे सच्चे और ईमानदार मनुष्य कम ही होते हैं। तुम्हें मारकर मैं पाप नहीं करना चाहता। जाओ, अपनी सच्चाई और नेकदिली से हमेशा लोगों का दिल जीतते रहो।" रामदीन ने शेर का धन्यवाद किया और प्रसन्न मन से अपने घर लौट गया।

शिक्षा:- हमें जीवन में हमेशा सच्चाई और ईमानदारी का पालन करना चाहिए। सत्य की राह कठिन हो सकती है, लेकिन अंत में वही जीतता है। जब इंसान अपने वचन और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहता है, तो स्वयं प्रकृति भी उसका साथ देती है।

कहानी का शीर्षक:-अहंकार 


कहानी:- शादी को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि सुधा और मोहन के बीच किसी छोटी-सी बात पर विवाद हो गया। दोनों ही शिक्षित थे, अपनी-अपनी नौकरियों में व्यस्त और स्वाभिमान से परिपूर्ण। जरा-सी अनबन हुई और दोनों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद हो गई। किसी ने पहल नहीं की, क्योंकि दोनों के मन में एक ही सवाल था—"पहले मैं क्यों झुकूं? मैं क्यों माफी मांगूं।"

तीन दिन बीत गए, पर मौन की दीवार जस की तस खड़ी रही। इस बीच, न जाने कितनी बार दोनों ने चाहा कि एक-दूसरे से बात कर लें, परंतु अपने-अपने अहंकार के कारण रुक गए।

सुधा ने सुबह के नाश्ते में पोहे बनाए, लेकिन गलती से उसमें मिर्च अधिक डाल दी। उसने स्वाद नहीं चखा, इसलिए गलती का आभास भी नहीं हुआ। मोहन ने भी गुस्से में चुपचाप तीखा नाश्ता खा लिया, बिना एक शब्द बोले। मिर्च इतनी ज्यादा थी कि ठंड के मौसम में भी वह पसीने से तर हो गया, पर उसने सुधा को कुछ भी नहीं बताया। जब बाद में सुधा ने पोहे खाए, तब उसे अपनी भूल समझ आई।

एक पल को मन में आया कि मोहन से क्षमा मांग ले, पर तभी उसे अपनी सहेली की सीख याद आ गई—"अगर तुम झुकीं, तो हमेशा तुम्हें ही झुकना पड़ेगा।" यह सोचकर वह चुप रह गई, हालांकि मन ही मन अपराधबोध से भर गई।

अगले दिन रविवार था। मोहन की नींद देर से खुली। घड़ी देखी तो नौ बज चुके थे। उसने सुधा की ओर देखा—वह अभी तक सो रही थी। यह देखकर वह चौंका, क्योंकि सुधा तो रोज़ जल्दी उठकर योग करती थी। उसने सोचा, "शायद नाराजगी के कारण लेटी होगी।"

मोहन खुद उठकर नींबू पानी बनाने चला गया। अख़बार लेकर बैठा, पर सुधा को अब भी सोता देख उसका ध्यान भटक गया। दस बज गए थे, लेकिन सुधा अब भी नहीं उठी। कुछ हिचकते हुए वह उसके पास गया और धीरे से बोला—"सुधा... दस बज गए हैं, अब तो उठो।"

कोई उत्तर नहीं मिला। उसने दो-तीन बार पुकारा, पर सुधा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अब उसका मन बेचैन हो उठा। उसने घबराकर कंबल हटाया और सुधा के गालों को छूकर देखा—उसका शरीर तप रहा था!

वह घबराकर रसोई में गया और अदरक की चाय बनाई। जल्दी से वापस आकर उसने सुधा को सहारा देकर उठाया और पीठ के पीछे तकिया लगा दिया।

"कोई दिक्कत तो नहीं कप पकड़ने में? क्या मैं तुम्हें पिला दूं?" मोहन की आवाज़ में चिंता और स्नेह का अद्भुत मिश्रण था।

सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "नहीं, मैं पी लूंगी।"

मोहन भी वहीं बैठकर चाय पीने लगा। उसके चेहरे पर चिंता स्पष्ट झलक रही थी।

"इसके बाद तुम आराम करो, मैं तुम्हारे लिए दवा लेकर आता हूं।"

सुधा चाय पीते-पीते मोहन को देखती रही। उसे याद आया कि कुछ देर पहले वह मायके जाने का निर्णय ले रही थी, और अब वही मोहन, जिससे वह तीन दिनों से बात भी नहीं कर रही थी, उसकी इतनी परवाह कर रहा था।

"मोहन..." सुधा ने धीमे स्वर में कहा।

"हाँ, क्या हुआ? सिर में बहुत दर्द हो रहा है क्या? आओ, मैं सहला दूं..." मोहन ने तुरंत पूछा।

"नहीं, मैं ठीक हूँ... बस एक बात पूछनी थी।"

"पूछो।"

"इतने दिनों से मैं तुमसे बात भी नहीं कर रही थी, और उस दिन नाश्ते में मिर्च भी ज़्यादा थी। तुम परेशान हुए, फिर भी मेरी इतनी देखभाल कर रहे हो... क्यों?"

मोहन ने गहरी सांस ली और मुस्कुराकर कहा, "परेशान तो मैं बहुत हूँ, क्योंकि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है। रही हमारे झगड़े की बात, तो जब जीवनभर साथ रहना ही है, तो कभी-कभी मतभेद भी होंगे, रूठना-मनाना भी होगा। दो बर्तन साथ होंगे तो खटपट तो होगी ही... समझीं मेरी जीवनसंगिनी?"

सुधा ने हल्की हँसी के साथ सिर हिलाया और मोहन के गले लग गई। मन ही मन उसने अपने आपसे वादा किया—"अब कभी अपने और मोहन के बीच अहंकार को आने नहीं दूंगी।"

शिक्षा:- इस कथा से हमें यह महत्वपूर्ण सीख मिलती है कि अहंकार (ईगो) रिश्तों को खोखला कर देता है। स्नेह, समझ और संवाद ही किसी संबंध की नींव को सुदृढ़ बनाते हैं। किसी भी रिश्ते में झुकना कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता की निशानी है। जीवनभर साथ रहने के लिए अहंकार को छोड़कर प्रेम को अपनाना ही सच्चा सुख है।

कहानी का शीर्षक:-तीन पुतले

कहानी:- मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का दरबार अपने भव्य स्वरूप में सजा हुआ था। स्वर्णिम छतरी के नीचे चमकते सिंहासन पर सम्राट विराजमान थे, और उनके चारों ओर विद्वानों, मंत्रियों तथा सेनापतियों की सभा आसीन थी। महामंत्री आचार्य चाणक्य अपने गहन ज्ञान और सूझबूझ से दरबार की कार्यवाही संचालित कर रहे थे।

चंद्रगुप्त को विलक्षण और अनोखी वस्तुओं का बड़ा शौक था, विशेषकर खिलौनों में उनकी रुचि असाधारण थी। प्रतिदिन वह कोई न कोई नया खिलौना देखने की इच्छा रखते थे। आज भी, जैसे ही उन्होंने उत्सुकतावश पूछा—

"आज हमारे लिए क्या नवीन उपहार आया है?"

एक दरबारी ने तुरंत सूचना दी—

"महाराज! एक दूरदेशीय सौदागर दरबार की दहलीज़ पर खड़ा है। वह दावा करता है कि उसने ऐसे अनूठे पुतले बनाए हैं, जिन्हें न तो आपने पहले कभी देखा होगा और न ही भविष्य में देखने को मिलेंगे।"

चंद्रगुप्त की जिज्ञासा प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने सौदागर को दरबार में बुलाने का आदेश दिया।

कुछ ही क्षणों में, एक कुटिल मुस्कान लिए सौदागर राजदरबार में प्रविष्ट हुआ। उसने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और अपनी झोली में से तीन सुंदर, सजीव-से प्रतीत होते पुतले बाहर निकाले। उन पुतलों की कारीगरी इतनी उत्कृष्ट थी कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता मानो वे किसी क्षण बोल उठेंगे।

सौदागर ने पुतलों को राजा के समक्ष रखते हुए कहा—

"महाराज, ये तीनों पुतले अद्वितीय हैं। देखने में एक जैसे हैं, किंतु इनके गुण भिन्न-भिन्न हैं। पहला पुतला एक लाख स्वर्ण मुद्राओं का है, दूसरा मात्र एक हजार मुद्राओं का, और तीसरे की कीमत केवल एक मुद्रा है।"

यह सुनकर सम्राट चकित रह गए। उन्होंने पुतलों को हर ओर से देखा, परंतु उनमें कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई दिया।

"इनमें इतना मूल्य अंतर क्यों?"— चंद्रगुप्त ने विस्मयपूर्वक पूछा।

मगर कोई उत्तर नहीं मिला। सभा में सन्नाटा छा गया। हर कोई पुतलों को उलट-पलट कर देखने लगा, परन्तु भेद कोई न पा सका। हारकर सम्राट ने महामंत्री चाणक्य की ओर देखा और कहा—

"गुरुदेव, आपके समक्ष कोई भी रहस्य अधिक देर तक छिपा नहीं रह सकता। कृपया इस गूढ़ पहेली को सुलझाने का कष्ट करें।"

चाणक्य मंद मुस्कुराए। उन्होंने पुतलों को ध्यानपूर्वक देखा और एक प्रहरी को आदेश दिया—

"तिनके ले आओ।"

सभी अचंभित थे। आखिर पुतलों का रहस्य तिनकों से कैसे खुलेगा?

कुछ ही क्षणों में, सैनिक तिनके ले आया। चाणक्य ने पहला तिनका उठाया और उसे पहले पुतले के कान में डाला। सभा में उपस्थित जन विस्मय से देखते रहे— तिनका सीधा पुतले के पेट में चला गया। कुछ क्षणों बाद पुतले के होंठ हिले, मानो वह कुछ कहने वाला हो, परंतु उसने कुछ नहीं कहा।

इसके बाद, आचार्य ने दूसरा तिनका दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार, सभी ने देखा कि तिनका दूसरे कान से बाहर निकल गया। किंतु पुतला वैसा ही स्थिर बना रहा।

अब चाणक्य ने तीसरे पुतले की बारी ली। जैसे ही तिनका उसके कान में डाला, वह सीधे पुतले के मुँह से बाहर निकल आया। और तब— पुतले का मुख खुल गया, मानो वह ऊँचे स्वर में कुछ चिल्ला रहा हो।

दरबार में हलचल मच गई। चंद्रगुप्त ने उत्सुकतावश पूछा—

"गुरुदेव! यह क्या रहस्य है? इन पुतलों का मूल्य इतना भिन्न क्यों है?"

चाणक्य गंभीरता से बोले—

"राजन! ये तीन पुतले मनुष्यों के स्वभाव के तीन भिन्न प्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं।"

फिर उन्होंने प्रथम पुतले की ओर इशारा कर कहा—

"यह वह व्यक्ति है जो सुनी-सुनाई बातों को अपने हृदय में संजोकर रखता है। वह पहले विचार करता है, फिर अपनी वाणी खोलता है। यह एक ज्ञानी और विवेकी पुरुष का प्रतीक है। ऐसा व्यक्ति अपने ज्ञान की गंभीरता और बुद्धिमत्ता के कारण अत्यधिक मूल्यवान होता है। इसी कारण, इस पुतले का मूल्य एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ है।"

इसके पश्चात, उन्होंने दूसरे पुतले की ओर संकेत करते हुए कहा—

"यह वह व्यक्ति है, जो कुछ भी सुनता है, किंतु न तो उस पर ध्यान देता है और न ही उसे दूसरों को बताने में रुचि रखता है। वह अपने ही संसार में मग्न रहता है। ऐसे व्यक्ति किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाते, परंतु किसी विशेष योगदान के अभाव में उनकी कीमत सीमित रहती है। अतः इसका मूल्य एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ है।"

अंत में, उन्होंने तीसरे पुतले की ओर दृष्टि घुमाई और बोले—

"यह तीसरा पुतला उन लोगों का प्रतीक है जो किसी भी बात को बिना सोचे-समझे तुरंत दूसरों को बता देते हैं। वे कान के कच्चे और मुँह के हल्के होते हैं। बिना सत्यापन के किसी भी सूचना को फैलाने वाले लोग समाज में भ्रम और अशांति उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए, इस पुतले का मूल्य केवल एक मुद्रा है।"

सम्राट चंद्रगुप्त ने गहरे चिंतन के साथ चाणक्य के शब्दों को आत्मसात किया। दरबार में बैठे सभी व्यक्तियों ने भी इस कथा से एक महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त की।

शिक्षा:- मनुष्य को सदैव विवेकपूर्ण ढंग से व्यवहार करना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं करना चाहिए, अपितु पहले तथ्यों की पुष्टि करनी चाहिए। ज्ञानवान व्यक्ति वही होता है, जो अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करता है।

आज के युग में भी यह शिक्षा अत्यंत प्रासंगिक है। जब सूचना तेजी से फैलती है, तब हमें यह निर्णय लेना चाहिए कि हम कौन-से पुतले की तरह बनना चाहते हैं—

▪️ वह जो सोच-समझकर बोलता है और समाज में आदर प्राप्त करता है?
▪️ वह जो अनसुना कर देता है, किंतु किसी को हानि नहीं पहुँचाता?
▪️ या वह, जो बिना सोचे-समझे कुछ भी कहकर समस्याएँ उत्पन्न करता है?
        निर्णय आपका है!

कहानी का शीर्षक:-परमात्मा से शिकायत क्यों?


कहानी:- एक समय की बात है, किसी राज्य में एक प्रतापी राजा शासन करता था। वह जितना वीर और बुद्धिमान था, उतना ही अपने सेवकों के प्रति उदार और प्रेमपूर्ण। किंतु उसके दरबार में एक सेवक ऐसा था जो राजा के हृदय के अत्यंत समीप था। यह सेवक केवल निष्ठावान ही नहीं, अपितु राजा का परम भक्त भी था। राजा भी उस पर अपार स्नेह रखता था और उसे अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के रूप में मानता था।

यह राजा का ही स्नेह था कि वह सेवक अन्य नौकरों की भांति अलग नहीं रहता था, बल्कि राजमहल के भीतर, स्वयं राजा के कक्ष में उसके साथ ही सोता था। राजा को उस पर इतना भरोसा था कि वह अपना हर कार्य पहले उसे सौंपता, अपनी हर बात उससे साझा करता।

एक दिन राजा अपने प्रिय सेवक के साथ शिकार पर गया। दिनभर वन में घूमते रहे, किंतु कोई बड़ा शिकार हाथ न लगा। दोपहर होते-होते वे घने जंगल में काफी भीतर चले गए और दिशा भूल गए। दोनों को तीव्र भूख लगने लगी, परंतु आसपास भोजन का कोई साधन न था।

तभी राजा की दृष्टि एक वृक्ष पर पड़ी, जिसके हरे-भरे पत्तों के बीच कुछ अपरिचित फल लगे थे। राजा ने एक फल तोड़ा, पर उसे पहचान न सका। फिर भी उसने अपनी आदत के अनुसार अपनी कटार निकाली, फल को बीच से चीरकर पहला टुकड़ा अपने सेवक को दिया। यह उसका नियम था—कोई भी चीज खाने से पहले वह अपने सेवक को परोसता था।

सेवक ने फल का टुकड़ा लिया, एक क्षण राजा की ओर देखा और बिना किसी झिझक के उसे अपने मुंह में रख लिया। जैसे ही वह स्वाद उसके जिह्वा से टकराया, उसकी आँखों में प्रसन्नता की एक अनोखी चमक दौड़ गई।

"मालिक! यह कितना मधुर है! कृपया मुझे एक और टुकड़ा दें!" सेवक ने आग्रह किया।

राजा ने प्रसन्नतापूर्वक दूसरा टुकड़ा दे दिया।

"मालिक! एक और..."

राजा मुस्कुराया और तीसरा टुकड़ा भी उसे दे दिया।

परंतु जैसे ही वह अंतिम टुकड़ा लेने लगा, राजा के मन में जिज्ञासा उठी। सेवक ने पहले कभी इस प्रकार किसी चीज के लिए आग्रह नहीं किया था। इस फल में ऐसा क्या विशेष था?

"बस, अब यह टुकड़ा मैं खुद चखूँगा।" राजा ने फल का अंतिम टुकड़ा अपने लिए रख लिया।

परंतु सेवक अचानक व्याकुल हो उठा।

"नहीं, मालिक! कृपया यह टुकड़ा मुझे दे दें!"

राजा ने उसकी यह अधीरता देखी और मन ही मन चकित हुआ। ऐसा तो कभी नहीं हुआ था! उसने संदेहवश टुकड़े को और दृढ़ता से पकड़ लिया।

अब दोनों के बीच छीना-झपटी होने लगी। सेवक ने भरसक प्रयास किया कि राजा उस टुकड़े को न खाए। किंतु राजा भी अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं सका और उसने वह टुकड़ा अपने मुंह में रख लिया।

जैसे ही फल की गंध और स्वाद उसके जिह्वा पर पड़ा, उसके चेहरे का रंग बदल गया। यह तो अत्यंत कटु और विषैला था! इतनी कड़वाहट उसने अपने जीवन में कभी अनुभव नहीं की थी। उसने तुरंत फल को थूका और क्रोध से सेवक की ओर देखा।

"पागल! यह तो जहर था! तूने मुझे बताया क्यों नहीं?"
"पागल! यह तो जहर था! तूने मुझे बताया क्यों नहीं?"

सेवक की आँखें प्रेम से भरी थीं। वह सिर झुकाकर बोला,

"मालिक! जब तक आपके हाथों से अनगिनत मधुर फल मिले, तब तक मैंने हर बार हर्षपूर्वक उन्हें स्वीकार किया। तो फिर एक कड़वे फल की क्या शिकायत करूँ?"

राजा स्तब्ध रह गया। यह उत्तर उसकी आत्मा को झकझोरने वाला था। उसकी आँखों में अश्रु उमड़ पड़े। इस सेवक ने उसे एक ऐसा पाठ पढ़ा दिया था, जिसे वह अपने जीवन में कभी नहीं भूल सकता था।

शिक्षा:- जीवन में हम परमात्मा से अनगिनत सुख प्राप्त करते हैं—स्वास्थ्य, परिवार, प्रेम, सफलता, आनंद। परंतु जैसे ही हमें कोई दुख मिलता है, हम तुरंत शिकायत करने लगते हैं। यदि हमने उन सुखद पलों में धन्यवाद देना सीखा, तो क्या हमें कठिनाइयों में भी धैर्य नहीं रखना चाहिए?

शिकायत हमें परमात्मा से दूर ले जाती है, जबकि कृतज्ञता हमें और समीप लाती है।

जो जीवन के मधुर फलों को प्रेमपूर्वक स्वीकार करता है, उसे कटुता भी सहजता से अपनाने की शक्ति मिलती है। और यही भाव एक दिन उसे पूर्णता की ओर ले जाता है—जहाँ केवल प्रेम, शांति और दिव्यता का साम्राज्य होता है।

कहानी का शीर्षक:-बेटी, भाभी और ननद – रिश्तों की सच्चाई


अक्सर बहुएँ शिकायत करती हैं कि ससुराल में उन्हें बेटी की तरह नहीं समझा जाता। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मायके में बेटी होने का मतलब क्या था? जब आप मायके में थीं, तब देर तक सोना, आराम से उठना, चाय-नाश्ता तैयार मिलना और घर के कामों की जिम्मेदारी माँ और मेड पर छोड़ देना आम बात थी। कभी-कभी मदद कर देना अलग बात है, लेकिन असल में आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी।

अब सोचिए, अगर आपकी माँ ने भी शादी के बाद यही सोचा होता कि वह ससुराल में बेटी की तरह रहेंगी, तो क्या आपको यह सुविधा मिल पाती? माँ ने अपने कर्तव्यों को समझा और उन्हें निभाया, तभी आपको आराम और सुरक्षा मिली। जब शादी के बाद आप पर भी जिम्मेदारी आती है, तो फिर घबराना क्यों? ससुराल में बहू बनकर रहना एक नई जिम्मेदारी है, जिसमें अपनापन खुद पैदा करना होता है।

जब आप मायके जाती हैं और आपकी भाभी देर तक सोती हैं, तब क्या आपको अच्छा लगता है कि आपकी माँ अकेले रसोई में काम करें? शायद नहीं। आप जरूर कहेंगी कि भाभी को भी मदद करनी चाहिए। लेकिन जब यही स्थिति आपकी ससुराल में होती है, तो आपको यह कठोर क्यों लगता है?

अब एक और परिस्थिति पर विचार करें। अगर आपकी भाभी सिर्फ अपने पति, बच्चों और सास-ससुर का ख्याल रखे, लेकिन देवर, ननद या अन्य सदस्यों से कोई मतलब न रखे, तो क्या आपको यह अच्छा लगेगा? यदि आपके भाई की शादी पहले हो गई और आपकी भाभी यह कहे कि वह आपके लिए खाना नहीं बनाएंगी, तो क्या आपके माता-पिता को यह स्वीकार होगा? शायद नहीं। हर घर का संतुलन आपसी समझ और सहयोग से चलता है, केवल अधिकारों की माँग से नहीं।

जब आप ससुराल में यह सोचती हैं कि ननद और उनके बच्चों का आना आपको कष्ट देता है, तो यह भी सोचिए कि आपकी भाभी के लिए भी आपका मायके आना वैसा ही हो सकता है। यदि आप चाहती हैं कि आपकी भाभी आपको अपनाए, तो आपको भी उसे वही अपनापन देना होगा। रिश्ते समझ और समर्पण से चलते हैं। जब तक आप खुद पहल नहीं करेंगी, तब तक आप दूसरों से अपनापन कैसे उम्मीद कर सकती हैं?

क्या आपने कभी अपनी माँ को मायके में वैसे ही महसूस करवाया, जैसा आप चाहती हैं कि ससुराल में आपको महसूस कराया जाए? शायद नहीं। फिर यह उम्मीद क्यों कि आपको बेटी जैसा रखा जाए?

माँ ने कभी शिकायत नहीं की कि उन्हें जल्दी उठना पड़ता था, घर संभालना पड़ता था। यहाँ तक कि जब वह बीमार भी होती थीं, तब भी आपके लिए खाना बनाती थीं। उनकी यही भावना थी, जिसने परिवार को जोड़े रखा। यही त्याग और समर्पण एक महिला को महान बनाता है।

जब एक लड़की शादी के बाद ससुराल जाती है, तो वह वहाँ की जिम्मेदारियों का हिस्सा बन जाती है। जिस तरह मायके में माँ और भाभी घर संभालती हैं, वैसे ही ससुराल में भी उसे जिम्मेदारियों को अपनाना चाहिए। मायके और ससुराल दोनों के रिश्ते प्रेम और सम्मान पर टिके होते हैं।

शिकायतों की बजाय यदि हम अपने व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाएँ, तो रिश्ते और भी मजबूत हो सकते हैं। परिवार केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों को निभाने से चलता है। जब आप अपने कर्तव्यों को समझकर निभाएँगी, तभी आपको भी वही सम्मान और अपनापन मिलेगा।

सीख:- रिश्ते अधिकारों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों और प्रेम से चलते हैं। मायके और ससुराल दोनों का सम्मान करें। जो महिलाएँ इस संतुलन को समझती हैं, वे ही सच्चे मायनों में सराहना की पात्र होती हैं। जब हम अपने कर्तव्यों को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, तभी हमें सच्चा अपनापन मिलता है।

कहानी का शीर्षक:-बुजुर्ग आवास


कहानी: पत्नी के अंतिम संस्कार और तेरहवीं के बाद रिटायर्ड पोस्टमैन मनोहर गाँव छोड़कर बेटे सुनील के पास मुंबई आ गए थे। सुनील ने उन्हें कई बार बुलाने की कोशिश की थी, लेकिन हर बार अम्मा यह कहकर रोक लेतीं— "बेटा-बहू की जिंदगी में क्यों दखल दें? यहीं ठीक है, सारी जिंदगी यहीं बीती है, अब जो थोड़ी-बहुत बची है, वो भी यहीं काट लेंगे।" अम्मा के जाने के बाद कोई रोकने वाला नहीं था, और बेटे के स्नेह के आगे मनोहर का मन भी झुक गया।

मुंबई पहुँचकर जब मनोहर घर में घुसे तो ठिठक गए। आलीशान मकान, चमचमाता फर्श, मुलायम कालीन—गाँव के साधारण घर से एकदम अलग।

"बाबूजी, आइए न!" सुनील ने उन्हें अंदर बुलाया।

मनोहर झिझकते हुए बोले, "बेटा, मेरे गंदे पैरों से कालीन खराब तो नहीं हो जाएगी?"

सुनील हँसकर बोला, "अरे बाबूजी, इसकी चिंता मत कीजिए। आइए, यहाँ सोफे पर बैठिए।"

जैसे ही मनोहर सोफे पर बैठे, नरम गद्दी के अंदर धँसते ही उनकी चीख निकल गई, "अरे रे! मर गया रे!"

सुनील हँस पड़ा, "बाबूजी, आदत पड़ जाएगी।" चाय के बाद उसने घर दिखाने की पेशकश की।

घर का एक-एक कोना देखकर मनोहर हैरान थे। "तो बच्चे माँ-बाप के साथ नहीं सोते?" उन्होंने आश्चर्य से पूछा।

"नहीं बाबूजी, यहाँ शहरों में बच्चों को जन्म से ही अकेले सोने की आदत डालनी पड़ती है। आया उनकी देखभाल करती है, और माँ बस समय-समय पर दूध पिला देती है," सुनील ने बताया।

मनोहर सुनकर चुप हो गए। आगे चलते हुए सुनील ने अपने और पत्नी के कमरे के बारे में बताया, फिर एक छोटे कमरे की ओर इशारा करते हुए कहा, "यह पालतू जानवरों के लिए है, अगर कभी कुत्ता पाला तो... और बाबूजी, यह है गेस्ट रूम।"

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए वे ऊपर पहुँचे, तो एक कोने में टीन की छत वाला कमरा दिखा। "बाबूजी, यह घर का कबाड़खाना है। टूटी-फूटी चीजें यहाँ रखी जाती हैं, और त्योहारों पर सफाई होती है।"

मनोहर ने देखा कि उसी कबाड़ख़ाने में एक फोल्डिंग चारपाई बिछी थी, जिस पर उनका बिस्तर और झोला रखा था। उन्होंने सुनील की ओर देखा, लेकिन वह तब तक नीचे जा चुका था।

चारपाई पर बैठते ही मनोहर सोचने लगे— कैसा यह घर है, जहाँ पालतू जानवरों के लिए अलग कमरा है, लेकिन बूढ़े माँ-बाप के लिए नहीं? मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था... सुनील की माँ सही कहती थी।

उस रात नींद मनोहर से कोसों दूर थी। अम्मा की बातें याद आ रही थीं। गाँव का घर, पड़ोस के लोग, चौपाल की चर्चा, तुलसी के पौधे वाला आँगन—सब आँखों के सामने घूम रहा था। वहाँ कम से कम कोई यह तो नहीं कहता कि वे कबाड़ हो चुके हैं!

सुबह जब सुनील चाय लेकर ऊपर पहुँचा, तो कमरा खाली था। बाबूजी का झोला भी नहीं था। उसने टॉयलेट और बाथरूम देखा, लेकिन वे वहाँ भी नहीं थे। घबराकर नीचे आया तो देखा कि मेन गेट खुला हुआ था।

उधर, मनोहर सुबह की ट्रेन से गाँव लौट रहे थे। उन्होंने कुर्ते की जेब में हाथ डाला, अपने घर की चाबी टटोल कर मुट्ठी में कस ली। चलती ट्रेन की हवा उनके चेहरे को सहला रही थी, जैसे उनके निर्णय को और मजबूत कर रही हो। घर लौटकर उन्होंने चैन की साँस ली।

गाँव पहुँचकर मनोहर ने देखा कि उनके आँगन की तुलसी वैसे ही हरी-भरी थी। पड़ोस के शर्मा जी दौड़ते हुए आए, "अरे मनोहर भाई! आप वापस आ गए?"

मनोहर हल्की मुस्कान के साथ बोले, "हाँ भाई साहब, अपने घर से बढ़कर कोई जगह नहीं।" उन्होंने दरवाजा खोला, धूल भरे आँगन को निहारा और धीरे से कहा, "यहाँ मैं कोई कबाड़ नहीं हूँ।"

शिक्षा: बुजुर्ग माता-पिता हमारे जीवन का आधार होते हैं। जैसे उन्होंने हमें बचपन में सँभाला, वैसे ही बुढ़ापे में उन्हें भी प्यार और सम्मान देना चाहिए। व्यस्तता के बीच उनके लिए समय निकालें, क्योंकि एक उम्र के बाद बचपन फिर से लौट आता है।

कहानी का शीर्षक:-ईश्वर पर भरोसा


एक बार की बात है, एक बहुत ही अमीर व्यक्ति था। जीवन में उसने खूब दौलत कमाई थी और अब वह थोड़ा सुकून चाहता था। एक दिन उसने सोचा कि क्यों न अकेले समुद्र की सैर की जाए। उसने खुद के लिए एक सुंदर-सी नाव बनवाई और छुट्टी के दिन अकेले ही समुद्र में निकल पड़ा।

शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था। ठंडी हवा, लहरों की आवाज़, और अकेलापन – सब कुछ शांत और सुखद। लेकिन अचानक मौसम ने करवट ली और एक भयंकर तूफान आ गया। उसकी नाव लहरों में डगमगाने लगी और आखिरकार चकनाचूर हो गई। किस्मत से वह लाइफ जैकेट पहने था, इसीलिए किसी तरह तैरते-तैरते वह एक वीरान टापू पर जा पहुंचा।

जब उसकी आंखें खुलीं तो सामने सिर्फ समुद्र और एक सुनसान टापू था। कोई इंसान नहीं, कोई आवाज़ नहीं – सिर्फ अकेलापन। लेकिन उस व्यक्ति ने हिम्मत नहीं हारी। उसने सोचा, "जब मैंने किसी का बुरा नहीं किया, तो मेरे साथ बुरा क्यों होगा? भगवान ने मुझे बचाया है, तो आगे का रास्ता भी वही दिखाएंगे।"

टापू पर उगे पेड़-पौधों के फल, पत्ते और झाड़ियाँ खाकर वह दिन बिताने लगा। समय बीतता गया, मगर कोई मदद नहीं आई। फिर भी उसने ईश्वर पर भरोसा नहीं छोड़ा।

कुछ दिनों बाद उसने सोचा, "पता नहीं कितने दिन और यहां रहना पड़े, क्यों न एक झोंपड़ी बना लूं?" उसने दिन भर मेहनत कर लकड़ियां और पत्ते इकट्ठा किए और शाम तक एक छोटी-सी झोंपड़ी बना ली। उसे तसल्ली हुई कि अब कम से कम बारिश-धूप से तो बचाव होगा।

वह झोंपड़ी के बाहर खड़ा उसे निहार ही रहा था कि अचानक आसमान में बिजली चमकी और ज़ोर की कड़क के साथ झोंपड़ी पर गिर पड़ी। उसकी मेहनत से बनी पूरी झोंपड़ी जलकर राख हो गई।

वह टूट गया... बिलकुल टूट गया।

आसमान की ओर देखकर वह चिल्लाया, "हे भगवान! ये तूने क्या किया? मैंने तो हमेशा तुझ पर भरोसा किया था। तुझसे कभी गिला नहीं किया, फिर भी तूने मेरी झोंपड़ी जला दी? क्या यही तेरा इंसाफ है?"

वह बैठ गया, सिर पकड़कर रोने लगा। लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया हो।

इसी बीच, एक आश्चर्य हुआ। दूर समुद्र में एक नाव आती दिखी। नाव टापू के पास रुकी और उसमें से दो लोग उतरकर उसके पास आए। उनमें से एक ने मुस्कुराते हुए कहा, "हम तुम्हें बचाने आए हैं। दूर से हमने इस टापू पर आग की लपटें देखीं। समझ गए कि यहां कोई मुसीबत में है। अगर तुम्हारी झोंपड़ी नहीं जलती, तो शायद हम कभी इस टापू की तरफ नहीं आते।"

यह सुनकर उस आदमी की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। वह भगवान के सामने नतमस्तक हो गया और बोला, "हे प्रभु, मुझे क्या पता था कि मेरी झोंपड़ी जलाना भी तेरी एक योजना थी। तूने मेरी झोंपड़ी नहीं जलाई, मेरी जिंदगी बचाई है। तूने मेरा इम्तिहान लिया, और मैं उस पर खरा नहीं उतर सका। माफ कर देना प्रभु। अब मुझे समझ में आया कि तू हमेशा अपने भक्तों का भला ही करता है – भले ही वो शुरुआत में बुरा क्यों न लगे।"

शिक्षा: इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि –
जब भी जीवन में तूफान आए, हालात विपरीत हों, या सब कुछ टूटता-बिखरता नज़र आए, तब भी ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।

कई बार ऐसा लगता है कि भगवान हमें भूल गए हैं या हमारे दुखों को नहीं देख रहे। लेकिन सच तो ये है कि परमात्मा हर पल हमारे साथ होते हैं, बस उनकी योजनाएं हमें तुरंत समझ नहीं आतीं।

हर दुख, हर परेशानी, हर ग़म... भगवान की उस योजना का हिस्सा है जो अंत में हमारे लिए कुछ अच्छा लेकर आती है। इसलिए जब कुछ भी समझ न आए, तब भी विश्वास बनाए रखिए – क्योंकि जो भी होता है, वह या तो अच्छा होता है... या बेहतर के लिए रास्ता बनाता है।

ईश्वर पर भरोसा रखो – वह कभी गलत नहीं करते।

कहानी का शीर्षक:-हीरे की पहचान


कहानी:- कभी-कभी जीवन हमें अनमोल उपहार देता है, लेकिन अज्ञानता, लोभ और अहंकार हमें उनकी सही पहचान करने नहीं देते। यही कहानी है एक कुम्हार, एक बनिए और दो जौहरियों की...

गांव के बाहर एक कुम्हार रोज की तरह मिट्टी खोद रहा था। उसका जीवन साधारण था—मेहनत भरा, लेकिन संतोषजनक। उस दिन उसकी कुदाल किसी सख्त चीज से टकराई। जब उसने ध्यान से देखा, तो उसे एक चमकता हुआ पत्थर मिला।

कुम्हार को लगा यह कोई सुंदर सा पत्थर है, शायद सजावट के काम आ जाए। उसने बिना ज्यादा सोचे उसे अपने गधे के गले में रस्सी से बांध दिया और फिर अपने काम में लग गया।

कुछ दिन बाद, गांव का एक बनिया वहां से गुजरा। उसकी नजर गधे के गले में बंधे उस पत्थर पर पड़ी। वह ठिठक गया, और आश्चर्य से बोला, "भाई, ये क्या बांध रखा है गधे के गले में?"

कुम्हार ने जवाब दिया, "कुछ खास नहीं, मिट्टी खोदते समय मिला था। चमकदार लगा तो गधे को सजा दिया। अगर तुम्हें अच्छा लगे तो ले जाओ, बदले में सवा सेर गुड़ दे देना।"

बनिया मुस्कराया। उसे भी वह सिर्फ एक आकर्षक पत्थर ही लगा। उसने गुड़ देकर पत्थर ले लिया और अपनी तराजू की डंडी पर बांध दिया, सजावट के लिए।

कुछ समय बीत गया। एक दिन कस्बे का एक जौहरी बनिए की दुकान पर आया। उसकी नजर उस पत्थर पर पड़ी, और वो चौंक गया। वह जानता था कि यह कोई मामूली पत्थर नहीं, एक बेशकीमती हीरा है।

जौहरी ने बनिए से पूछा, "भाई साहब, ये पत्थर कितने में दोगे?"

बनिए ने सहज भाव से कहा, "पांच रुपए दे दो, ले जाओ।"

जौहरी की आंखों में लालच उतर आया। उसने कहा, "पांच नहीं, चार रुपए ले लो। आखिर तुम्हें ये सस्ता ही पड़ा होगा।"

बनिया बोला, "भाई, मैंने इसे सवा सेर गुड़ देकर लिया है, चार में नहीं दूंगा।"

जौहरी सोचने लगा, कोई जल्दी नहीं है। कल आऊंगा और पांच में खरीद लूंगा। बनिया तो इसे पहचानता नहीं है।

लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था।

कुछ ही देर बाद एक दूसरा जौहरी बनिए की दुकान पर आया। उसकी नजर भी उसी पत्थर पर पड़ी और वह पहचान गया कि ये असल में एक कीमती हीरा है। उसने झट से पूछा,
"भाई, ये पत्थर कितने में दोगे?"

बनिए ने फिर वही जवाब दिया, "पांच रुपए।"
दूसरे जौहरी ने तुरंत पैसे दिए और खुशी-खुशी हीरा लेकर चला गया।

अगले दिन पहला जौहरी फिर दुकान पर पहुँचा। पांच रुपए बढ़ाते हुए बोला, "लो भाई, अब दो वो पत्थर।"

बनिए ने मुस्कराकर कहा, "भाई, वो तो कल ही कोई ले गया।"

यह सुनते ही जौहरी के चेहरे पर निराशा छा गई। उसने गुस्से और पछतावे में कहा, "अरे मूर्ख! वो कोई साधारण पत्थर नहीं था। वो तो एक लाख रुपए का हीरा था!"

बनिया शांत स्वर में बोला, "मूर्ख तो आप हैं। मुझे तो वो एक साधारण पत्थर ही लगा, जिसकी कीमत मैंने सवा सेर गुड़ चुकाकर दी थी। लेकिन आप तो उसकी असली कीमत जानते थे, फिर भी एक रुपए के लालच में उसे खो बैठे। असली नुकसान किसका हुआ?"

जौहरी अवाक रह गया। अब उसके पास पछतावे के अलावा कुछ नहीं था।

शिक्षा:- हमारे जीवन में कई बार ऐसे लोग, अवसर या संबंध आते हैं जो हीरे की तरह अनमोल होते हैं। लेकिन यदि हम उन्हें पहचान नहीं पाते या पहचानकर भी समय रहते नहीं अपनाते, तो बाद में सिर्फ पछताना ही हाथ लगता है।

कभी-कभी हम जिन चीजों को सामान्य समझते हैं, वही सबसे बहुमूल्य होती हैं। और कभी हम जानकर भी किसी चीज की कद्र नहीं करते, बस थोड़े लाभ के लालच में सब खो बैठते हैं।

इसलिए सच्चे लोगों, अच्छे संबंधों और जीवन के अवसरों को पहचानना और उनका सम्मान करना सीखिए—क्योंकि वक्त किसी का इंतज़ार नहीं करता।

कहानी का शीर्षक:- भाईयों का संबंध


कहानी:- अयोध्या में फिर से सुख-शांति लौट आई थी। वर्षों पहले समाप्त हुआ वनवास अब स्मृतियों में ढल चुका था। प्रभु श्रीराम, माता सीता और उनके अनुजों के नेतृत्व में अयोध्या फिर से समृद्ध और धर्मनिष्ठ बन गई थी। प्रजा सुखी थी, संतुष्ट थी, और राजपरिवार—त्याग, सेवा और प्रेम का साक्षात रूप।

एक दिन संध्या के समय सरयू नदी के तट पर चारों भाई—राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न टहल रहे थे। आकाश की लाली, बहती सरयू, और ठंडी बयार मानो चारों भाइयों के प्रेम का संगीत गा रही थी।

थोड़े मौन के बाद भरत ने धीरे से पूछा,
"भइया, एक बात मन में वर्षों से है… आज पूछने का साहस कर रहा हूँ।"

राम ने स्नेह से उसकी ओर देखा, “पूछो भरत।”

भरत बोले, “माता कैकई और मंथरा ने जो षड्यंत्र किया था, वह क्या राजद्रोह नहीं था? उनके कारण आपको वनवास झेलना पड़ा, माता सीता को कष्ट हुआ, लक्ष्मण ने अपने जीवन का बड़ा भाग वन में गुज़ारा, और पिताजी तो उस दुःख को सह ही नहीं सके। ऐसे अपराध के लिए तो मृत्युदंड होता है। फिर आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया?”

राम शांत थे। उनके मुख पर वही धीर गंभीर मुस्कान थी। बोले,
“भरत, जिस माता ने तुम जैसे धर्मात्मा को जन्म दिया हो, उसे दंड कैसे दिया जा सकता है? तुम स्वयं उनके जीवन का सबसे पवित्र प्रमाण हो। यदि किसी कुल में एक निष्ठावान पुत्र जन्म ले, तो वह पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित बन जाता है।”

भरत ने सिर झुकाया, लेकिन बात अधूरी लगी। वे फिर बोले,
“भइया, यह तो मोह है। आप मेरे बड़े भाई हैं, इसलिए कह रहे हैं, पर एक राजा के रूप में आपको मोह से ऊपर उठकर न्याय करना चाहिए था। सोचिए, आपसे यह प्रश्न आपका भाई नहीं, अयोध्या का एक नागरिक पूछ रहा है।”

राम अब गम्भीर हो गए। सरयू की लहरों पर उनकी दृष्टि थम गई।

“भरत,” वे बोले, “अपने सगे-सम्बंधियों के अपराध पर कोई दंड न देना ही इस सृष्टि का सबसे कठोर दंड है। माता कैकई ने जो भोगा है, वह किसी राज्यदंड से कहीं अधिक पीड़ादायक है।”

“चौदह वर्षों तक हम वन में थे, एक-दूसरे का सहारा बनकर। पर माँ? वे अकेली थीं। उन्होंने पति को खोया, अपने चारों पुत्रों से स्नेह खोया, और सबसे बड़ा दंड—उन्होंने अपना आत्मसम्मान खो दिया। उन्होंने हर दिन आत्मग्लानि के साथ जिया है। क्या तुम जानते हो भरत, वे रातों को जागकर मेरे नाम का जाप करती थीं… एक बार भी प्रसन्न नहीं हुईं जब हम लौटे। वनवास हमारा बीत गया, पर उनका आज भी जारी है।”

इतने में शत्रुघ्न, जो अब तक मौन थे, भावुक होकर बोले,
“भइया, मैंने माँ को रोज़ उस अपराधबोध में तिल-तिल मरते देखा है। वे अक्सर एकांत में कहती थीं—‘राम को वन भेजा नहीं, मैंने खुद को निर्वासित किया है।’ उनका मौन ही उनके अपराध की सजा बन गया।”

राम ने एक क्षण के लिए आँखें बंद कीं, और फिर कहा,
“भरत… क्या हम माँ की उस भूल को भूल नहीं सकते? यदि वह वनवास न होता, तो यह संसार देख भी पाता कि भाईयों का प्रेम क्या होता है? लक्ष्मण ने मेरे साथ हर संकट में रहकर सेवा की। तुमने राजसिंहासन को ठुकराकर खड़ाऊँ को राज्य का भार सौंपा। और शत्रुघ्न, जिन्होंने भरत की पीड़ा को अपना धर्म समझा… यह सब संसार के लिए एक आदर्श बन गया।”

“मैंने केवल माता-पिता की आज्ञा मानी थी, लेकिन तुम तीनों ने मेरे लिए जो किया… वह स्नेह, वह त्याग, वह समर्पण… इस संसार को भाइयों के संबंध का सच्चा अर्थ समझा गया।”

अब भरत की आँखों में आँसू थे। वे आगे बढ़े और राम से लिपट गए। शत्रुघ्न और लक्ष्मण भी पास आ गए। चारों भाई एक दूसरे के प्रेम में भीगे हुए, भावनाओं के उस बंधन में बंधे थे, जिसे कोई युद्ध, कोई षड्यंत्र, कोई वनवास नहीं तोड़ सका।

दूर महल के एक कक्ष में, माता कैकई प्रार्थना में बैठी थीं। आँखों से अश्रु बह रहे थे, पर चेहरे पर शांति थी। जैसे वर्षों बाद उनके अपराधबोध को कोई मूक क्षमा मिल गई हो।

सरयू की लहरें उसी शांत धुन में बह रही थीं—कह रही थीं—

“जहाँ प्रेम है, वहाँ क्षमा है।
जहाँ त्याग है, वहाँ धर्म है।
और जहाँ भाईचारा है, वहाँ रामराज्य है।”

शिक्षा:- जीवन में कभी-कभी सबसे कठोर दंड वही होता है जो बिना कहे, बिना सुनाए आत्मा को भीतर ही भीतर जलाता है। अपनों को माफ कर देना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है।

प्रेम, त्याग और क्षमा—इन्हीं में जीवन का सच्चा धर्म बसता है। और भाई-भाई का संबंध—यह केवल रक्त से नहीं, आत्मा के अदृश्य धागों से बंधा होता है।

राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—चारों ने मिलकर जो भाईचारे की मिसाल रखी, वह युगों-युगों तक संसार को सिखाती रहेगी कि ‘भाइयों का संबंध’ वास्तव में होता क्या है।

कहानी का शीर्षक:-मां का तमाचा


कहानी: "मां, मैं और मीना कुछ दिन के लिए गोवा जा रहे हैं।"

"अच्छा है बेटा, बहुत वक्त हो गया तुम दोनों को ऐसे कहीं गए हुए। अब समय भी है और ज़रूरत भी।"

"हां… और एक बात और थी…"
राजेश की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।
"हमारा लौटते ही… हम सोच रहे थे कि आपको वृद्धाश्रम छोड़ आएं। सारी जानकारी ले ली है मैंने। अच्छा माहौल है, लोग भी अच्छे हैं। अकेलापन भी नहीं लगेगा आपको।"

कुछ पल की चुप्पी छा गई।

मां ने सिर उठाकर देखा। एक पल के लिए कुछ कहना चाहा, लेकिन फिर मुस्कुरा कर बोलीं —
"ठीक है बेटा… जैसा तुम्हें ठीक लगे।"

अगले दिन राजेश और मीना निकल गए।
गोवा की चकाचौंध, समंदर का किनारा, होटल की रील्स, हर लम्हा उन्होंने जी भरकर जिया।

उधर घर में मां अकेली थीं…
लेकिन वो कोई शिकायत नहीं कर रही थीं, न ही किसी से कुछ कह रही थीं।
बस चुपचाप कुछ पुरानी तस्वीरें देखती रहीं, आंगन बुहारती रहीं, और रसोई की सफाई करती रहीं।
उनके भीतर कुछ टूट रहा था… लेकिन वो बिखरने नहीं दे रहीं थीं।

चार दिन बाद जब राजेश और मीना लौटे, तो दरवाजा खुलते ही कुछ बदला-बदला सा लगा।

घर चमचमा रहा था।
हर चीज़ अपनी जगह पर करीने से रखी हुई।
रसोई से उनकी पसंदीदा कढ़ी-चावल और हलवे की खुशबू आ रही थी।

"मम्मीजी ने ये सब अकेले किया होगा?" मीना ने हैरानी से पूछा।

"लगता है फेयरवेल पार्टी है हमारी तरफ से," राजेश ने हल्का सा मज़ाक उड़ाया।

वो दोनों जैसे ही ड्राइंग रूम में आए, मां सामने खड़ी थीं।
सीधी, शांत, लेकिन इस बार उनकी मुस्कान में कुछ अलग था।

"आ गए बेटा? अच्छा किया। बैग तैयार है मेरा। चलने से पहले बस एक बार कमरे में आओ, कुछ दिखाना है।"

कमरे में दीवार पर कुछ तस्वीरें थीं —
राजेश की स्कूल की यूनिफॉर्म में, उसका पहला साइकिल चलाना, पहली नौकरी का ऑफर लेटर… और बीच में एक फ्रेम था, जिसमें बड़े सादे शब्दों में लिखा था:

"मां की सेवा कोई एहसान नहीं होती,
वो तो उसका हक होता है — जो उसने बिना कहे, उम्र भर निभाया है।"

मां ने पीछे मुड़कर कहा,
"राजेश, जब तू छोटा था, तो हर बार गिरने पर मैं दौड़ कर आती थी।
अब जब मैं बूढ़ी हुई हूं, तो मुझे ही घर से बाहर कर रहे हो?"

मीना की आँखें भर आईं। वो चुपचाप मां के पास जाकर उनके पैरों में बैठ गई।
"मां… हमसे गलती हो गई। हम सोच नहीं पाए कि हमने क्या कह दिया था…"

राजेश अब भी चुप था, जैसे उसकी ज़ुबान बंद हो गई हो।

मां धीरे से उसके पास आईं, उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा:
"बेटा, मैंने तुम्हें हमेशा सिर उठाकर जीना सिखाया।
पर आज जो तुमने कहा… वो किसी थप्पड़ से कम नहीं था। 'का तमाचा पड़ा है न बेटा… सीधा आत्मा पर?'"

राजेश फूट-फूटकर रोने लगा।

सीख: मां-बाप हमें बोलकर कभी शिकायत नहीं करते, क्योंकि उन्होंने देना सिखाया होता है, लेना नहीं। पर जब वो चुप हो जाएं — तो समझ लो कि उन्होंने तुम्हें माफ नहीं किया, बस खुद को संभाल लिया है।

कहानी का शीर्षक:- विश्वास


तन्विक एक जाने-माने साधु थे। उनका जीवन सादगी और सच्चाई से भरा था। वे दिखावे से दूर, बस सेवा और ज्ञान बांटने में यकीन रखते थे। लोग उन्हें एक आदर्श पुरुष की तरह मानते थे। हर जगह उनके ज्ञान और ईमानदारी की मिसालें दी जाती थीं।

एक बार उन्हें नयासर राज्य के राजा से मिलने जाना था। राजा ने उन्हें बुलाया था— शायद मार्गदर्शन चाहिए था, या सिर्फ एक सच्चे इंसान से मिलना चाहता था। तन्विक ने अपनी झोली में कुछ ज़रूरी सामान रखा और एक कीमती हीरा भी रख लिया। यह हीरा उन्हें एक पुराने राजा ने भेंट किया था, उनकी ईमानदारी से प्रभावित होकर। अब वे यही हीरा नयासर के राजा को सौंपना चाहते थे, एक प्रतीक के रूप में।

वे समुद्री जहाज से निकले। सफर लंबा था, पर तन्विक के लिए ये भी साधना ही थी। रास्ते में वे कई यात्रियों से मिले, बातें कीं, और जैसे हर किसी के जीवन में थोड़ा उजाला भर दिया। उनके शब्द सादे थे, पर असर गहरा छोड़ते थे।

उसी जहाज पर एक फकीर भी था। नाम नहीं पता, बस वह खुद को सूफी और ज्ञानी कहता था। उसने देखा कि लोग साधु के इर्द-गिर्द रहते हैं, बातें सुनते हैं, आदर करते हैं। शायद उसे जलन हुई।

वो धीरे-धीरे साधु के करीब आने लगा। मीठी-मीठी बातें करता, हाथ बंटाता और विश्वास जीतने की कोशिश करने लगा। कुछ दिन बाद, साधु ने उस पर भरोसा करके उसे वह हीरा दिखा दिया— बस यूं ही, सहज भाव से।

बस, यहीं से फकीर के मन में लालच ने घर कर लिया। उसने सोचा, "ये हीरा मेरे पास हो तो... ज़िंदगी बदल सकती है!"

रात को उसने साधु के सोने का इंतज़ार किया। जब सब शांत हो गया, वह चुपचाप उठा और साधु का झोला, उनके कपड़े— सब छान डाले। लेकिन हीरा कहीं नहीं मिला।

सुबह होते ही वह फिर साधु के पास आया, और ऐसे कहा, जैसे वह उनकी चिंता कर रहा हो— "बाबा, इतना कीमती हीरा है, ध्यान से रखना... इन दिनों भरोसे के लोग कम हैं।"

साधु मुस्कराए, झोली खोली, और हीरा दिखा दिया।

फकीर की आँखें फटी रह गईं। "कल रात तो पूरा सामान उलट-पलट दिया था... फिर भी ये कहाँ से आ गया?"

उसने सोचा, "आज फिर कोशिश करता हूँ, ज़रूर कोई जगह छूट गई होगी।"

शाम होते ही उसने सिर दर्द का बहाना बनाया और जल्दी सो गया। आधी रात को फिर वही दोहराया— खोजबीन, उलट-पलट— करने पर भी कुछ नहीं मिला।

अब फकीर के सब्र का बांध टूट चुका था। अगली सुबह उसने साधु से साफ-साफ पूछ लिया— "बाबा, दो रातों से मैं आपकी झोली और कपड़े खंगाल रहा हूँ, मुझे कबूल है। पर मुझे वह हीरा नहीं मिला। ऐसा कैसे?"

साधु ने उसकी ओर देखा— गुस्से से नहीं, दया और शांति से। बोले, "मुझे शुरू से पता था कि तुम्हारे मन में कुछ खोट है। इसलिए मैं पिछले दो रातों से वह हीरा तुम्हारे ही कपड़ों में छुपा देता था। और सुबह तुम्हारे उठने से पहले चुपचाप वापस ले लेता था।"

फकीर भौचक्का रह गया। "मेरे कपड़ों में? पर मैं तो... मैंने खुद टटोला था!"

"बिलकुल," साधु बोले, "लेकिन इंसान सबसे कम अपने भीतर झांकता है। हमें लगता है कि दोष दूसरों में है, गलती बाहर है। खुद के अंदर देखने की आदत ही नहीं रही।"

कहानी का शीर्षक:- कलयुग का दरोगा


कहानी:- गांव के एक छोटे से किनारे पर, झोंपड़ी में रहने वाला बृजलाल नामक एक गरीब किसान रहता था। ज़मीन थोड़ी थी, शरीर थका हुआ, लेकिन मन में ईमानदारी और भगवान पर अटूट विश्वास था।

एक दिन सुबह के वक्त, जब वो अपने छोटे से खेत में गया, तो उसकी निगाह एक हरे-भरे पौधे पर पड़ी। हैरानी की बात ये थी कि उसने वहां कुछ बोया ही नहीं था, लेकिन लौकी का पौधा लहलहा रहा था। और उस पर तीन मोटी-ताज़ी लौकियाँ लगी थीं—साफ़, चमकती हुई, मानो खुद कुदरत ने उसे एक तोहफा भेजा हो।

उसने खुशी-खुशी तीनों लौकियाँ तोड़ीं, घर लौटते हुए बच्चों से कहा, "अगर ये बिक गईं, तो मिठाई लाऊंगा।" घरवालों की आंखों में एक उम्मीद सी चमक उठी।

गाँव के हाट में पहुंचकर बृजलाल एक किनारे बैठ गया। भीड़-भाड़ से दूर, सिर पर पुरानी टोपली लगाए, आँखों में एक भोलापन लिए वो राहगीरों की तरफ उम्मीद से देखता रहा।

तभी गाँव के प्रधान जी आये। भारी मूँछें, सीना फुलाया हुआ, और साथ में दो चमचों की टोली। उन्होंने एक लौकी उठाई और बोले, "बृजलाल, बाद में पैसे दे दूंगा।" किसान ने कुछ कहने की कोशिश की, पर शब्द गले में अटक गए। प्रधान चलते बने।

कुछ देर बाद थाने का मुंशी रामदयाल आया। बिना कुछ पूछे दूसरी लौकी उठाई और बोले, "कितनी बढ़िया माल है, भई वाह!" और मुस्कुराते हुए चल दिया।

अब बस एक लौकी बची थी। बृजलाल का मन घबरा रहा था। वह आसमान की तरफ देखकर बुदबुदाया, "हे भगवान, कम से कम ये बचा ले।"

तभी सामने से दरोगा रघुनाथ सिंह आते दिखाई दिए—ऊँचा कद, मूंछें तनी हुईं, आँखों में तेज और चेहरे पर कठोर पर सच्ची इंसानियत का भाव।

उन्होंने रुककर पूछा, “किसके लिए बैठा है लौकी लेकर?”

बृजलाल हकलाते हुए बोला, “मालिक… दो तो ले गए… ये बची है, आप चाहें तो ले जाइए…”

दरोगा ने गौर से देखा। कुछ समझ में आया। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “बताओ, क्या हुआ?”
किसान ने धीरे-धीरे पूरा हाल सुना दिया।

दरोगा मुस्कुराए। बोले, “चलो, मेरे साथ।”

पहले वो प्रधान जी के घर पहुंचे। वहां प्रधान जी चारपाई पर ताव देते बैठे थे और उनकी पत्नी लौकी काट रही थी। दरोगा ने पूछा, “ये लौकी कहाँ से लाई?”

प्रधान बोले, “बाजार से खरीदी है।”
“कितने में?” दरोगा ने फिर पूछा।

अब प्रधान जी की आवाज़ हल्की हो गई, आँखें बृजलाल पर टिक गईं। दरोगा ने तीखा स्वर अपनाया, “सीधा-सीधा बोलो। किसान को एक हज़ार रुपये दो नहीं तो चोरी और दबाव की FIR लिखूँगा।”

बहुत कहासुनी के बाद, प्रधान ने बुझे मन से एक हज़ार रुपये थमा दिए।

फिर दरोगा किसान को लेकर थाने पहुंचे। वहां सब सिपाही कतार में खड़े किए गए। बृजलाल ने कांपते हुए एक हवलदार की तरफ इशारा किया। दरोगा गरजे, “वर्दी में हो और हरकत चोरों जैसी? शर्म नहीं आती?”

उन्होंने जेब से हज़ार रुपये निकलवाए और किसान को सौंप दिए।

अब बृजलाल और भी घबरा गया। सोच रहा था, कहीं दरोगा अब सब रुपये न छीन ले।

वो धीरे से जाने लगा।

तभी दरोगा ने आवाज़ लगाई, “अरे रुक, तीसरी लौकी का क्या?”

फिर उन्होंने अपने पर्स से एक हज़ार का नोट निकाला और किसान के हाथ में रखा। बोले, “ये तीसरी लौकी का दाम है। अब जब भी किसी ने तुझे सताया, सीधे मेरे पास आना।”

बृजलाल की आंखें भर आईं। वह हाथ जोड़कर बोला, “मालिक, आज के दिन भगवान ने खुद दरोगा का रूप लिया है।”

शिक्षा:- जब नीयत सच्ची हो और किसी के हक़ के लिए आवाज़ उठाई जाए, तो न्याय ज़रूर होता है। हर ज़माने में अच्छाई ज़िंदा रहती है—कभी किसी दरोगा के रूप में, कभी किसी किसान की आह में।

फकीर का चेहरा अब शर्म से लाल हो गया। लेकिन ये शर्म पश्चाताप नहीं, बल्कि अहं की चोट थी। वह सोचने लगा— "इसने मुझे नीचा दिखा दिया, अब इसकी साख मिटाऊंगा!"

उसने रातभर एक योजना बनाई। अगली सुबह वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा— "मेरा हीरा चोरी हो गया! कोई तो मदद करो!"

जहाज पर अफरातफरी मच गई। सब यात्रियों की तलाशी होने लगी। जब साधु की बारी आई, तो कई लोगों ने विरोध किया— "इन पर शक करना तो पाप है!"

लेकिन साधु ने कहा— "नहीं, अगर किसी के मन में भी ज़रा सा भी शक बाकी रह जाए तो मेरी वर्षों की तपस्या व्यर्थ हो जाएगी। मैं खुद चाहता हूँ कि मेरी भी तलाशी ली जाए।"

तलाशी ली गई। कुछ नहीं मिला।

दो दिन बाद, जब यात्रा खत्म होने को आई, फकीर फिर साधु के पास गया— अब बुझा-बुझा सा। धीरे से बोला— "बाबा... अब की बार मैंने अपने कपड़े भी देखे। हीरा तो आपके पास होना चाहिए था... वो कहाँ गया?"

साधु ने मुस्कराते हुए कहा— "समंदर में फेंक दिया।"

"क्या?! वो इतना कीमती हीरा..."

"हाँ। लेकिन मेरे लिए वो हीरा कीमती नहीं था। मेरे लिए ईमानदारी और विश्वास ज़्यादा कीमती हैं। अगर किसी ने भी उस हीरे को मेरे पास देखकर थोड़ा भी शक कर लिया होता, तो मेरी वर्षों की कमाई— वो विश्वास— डगमगा जाता।"

"मैं हीरा खो सकता हूँ, लेकिन लोगों का विश्वास नहीं। यही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।"

फकीर की आंखें भर आईं। वह साधु के पैरों में गिर पड़ा, रोने लगा।

"मुझे माफ़ कर दो बाबा... मैंने बहुत बड़ी गलती की।"

साधु ने उसे उठाया और सिर्फ इतना कहा— "अगर तुमने अपने भीतर झांकना शुरू कर दिया है, तो समझो सब कुछ पा लिया।"

उस दिन से फकीर उनके साथ रहने लगा, उनका शिष्य बन गया। और सच मानो, साधु तन्विक की सबसे बड़ी जीत वही फकीर था— जिसे उन्होंने जीत लिया था अपने विश्वास से।


शिक्षा: सच्चा धन वह नहीं जो दिखता है, बल्कि वो है जो भीतर होता है— सच्चाई, ईमानदारी और दूसरों का विश्वास। यह कहानी हमें सिखाती है कि जब भी कोई फैसला लो, वह अपने चरित्र के आधार पर लो— न कि लालच या डर के कारण। और सबसे बड़ी बात— खुद के भीतर झांकना कभी न भूलो, क्योंकि सच्चे जवाब वहीँ मिलते हैं।

कहानी का शीर्षक:-समस्या रूपी बंदर


कहानी:- काशी की संकरी गलियाँ, जिनमें इतिहास और अध्यात्म की साँसें एक साथ चलती थीं, उस दिन कुछ अलग ही कहानी बुन रही थीं। स्वामी विवेकानंद, जो अपने ओजस्वी विचारों और अद्भुत आत्मबल के लिए विख्यात थे, दिन के समय शहर की एक गलियों से गुजर रहे थे। उनका मन शांत था, ध्यान भीतर केंद्रित था और आँखें उस यात्रा की अनुभूति में डूबी थीं।

जैसे ही वे एक पतली गली में मुड़े, सामने अचानक ही बंदरों का एक झुंड आ गया। ये बंदर सामान्य नहीं थे—उत्कंठित, उग्र और मानो किसी बात से चिढ़े हुए। जैसे ही स्वामी जी उनके पास से गुजरने लगे, बंदरों ने उन्हें घेर लिया। एक बंदर उनके कंधे पर चढ़ने लगा, दूसरा उनके वस्त्र खींचने लगा। गली इतनी संकरी थी कि पीछे लौटने के अलावा कोई और रास्ता न था।

स्वामी जी सहज स्वभाववश डर गए और पलटे, पीछे की ओर भागने लगे। पर बंदरों को जैसे और बल मिल गया हो। वे उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगे—एक ने झपट्टा मारा, कपड़ा फाड़ दिया, दूसरे ने पंजा मारा, खरोंचें आ गईं। स्वामी जी का चेहरा पसीने से भीग गया और वस्त्र जगह-जगह फट चुके थे।

इसी बीच एक वृद्ध व्यक्ति, जो पास के मकान की खिड़की से सब देख रहा था, ऊँची आवाज में चिल्लाया —
"स्वामी जी! रुक जाओ, भागो मत! सामना करो। घूंसा तानो, डरो मत।"

ये शब्द बिजली की तरह स्वामी जी के कानों में गूंजे। उन्होंने पल भर को रुक कर गहराई से उस आवाज पर विचार किया। फिर साहस जुटाया, मुड़े, आँखों में तेज भर लिया और दोनों मुट्ठियाँ तानकर बंदरों की ओर एक कदम आगे बढ़ाया।

"जा हट!" उन्होंने गरजते हुए कहा।

बंदर, जो अब तक शिकार समझ रहे थे, उस दृढ़ता और निर्भीकता से चौकन्ने हो गए। उन्होंने कुछ पल देखा... फिर एक-एक करके पीछे हटने लगे। कुछ छत पर कूद गए, कुछ गलियों की दूसरी दिशा में भाग गए।

स्वामी जी ने राहत की साँस ली। शरीर पर खरोंचें थीं, वस्त्र विदीर्ण थे, पर मन में एक नया आत्मविश्वास जाग उठा था। वो गली, जो कुछ क्षण पहले भय का प्रतीक बन गई थी, अब विजय की राह बन चुकी थी।

जब वे बाद में इस घटना को अपने शिष्यों और मित्रों को सुनाते, तो एक नई चमक उनकी आँखों में होती। वो कहा करते:

"संकट जीवन का हिस्सा हैं। जब हम उनसे भागते हैं, वे पीछा करते हैं। पर जब हम उनका सामना करते हैं, तो वे भयभीत हो जाते हैं। जीवन की हर समस्या उस बंदर की तरह होती है जो पीछा करता है — जब तक हम डटकर खड़े नहीं हो जाते।"


शिक्षा:- यह प्रेरणादायक प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन की समस्याओं से भागना समाधान नहीं है। हमें अपने भीतर साहस और आत्मबल को जगाकर उनका सामना करना चाहिए। डर और हिम्मत के बीच बस एक निर्णय का अंतर होता है। और जो उस क्षण साहस चुनता है, वो जीवन की सबसे कठिन गलियों को भी मुस्कुराते हुए पार कर जाता है।

कहानी का शीर्षक:- मेहनत के फल का महत्व


कहानी:- सूर्यनगर की चहल-पहल भरी गलियों में एक भव्य हवेली थी, जिसके स्वामी थे विश्वनाथ, एक सम्मानित और मेहनती व्यापारी। उनकी जिंदगी में धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, पर वर्षों तक उनके घर में संतान सुख का अभाव रहा। लंबी प्रतीक्षा और अनगिनत प्रार्थनाओं के बाद, उनकी पत्नी सावित्री ने एक पुत्र को जन्म दिया। इस पुत्र का नाम रखा गया चंद्रकांत—उनके जीवन का वह चांद, जो उनकी दुनिया को रोशन करने आया था।

चंद्रकांत के जन्म ने हवेली में खुशियों की बरसात कर दी। विश्वनाथ और सावित्री, जिन्होंने इतने वर्षों तक संतान के लिए तरसते हुए दिन गुजारे थे, अपने बेटे को सिर-आंखों पर बिठाने लगे। नौकर-चाकर, रिश्तेदार, और पड़ोसी—सभी चंद्रकांत को लाड़-प्यार से नहलाते। उसकी हर इच्छा, चाहे वह रंग-बिरंगे खिलौने हों, रेशमी वस्त्र हों, या मिठाइयों की थाल, पलक झपकते पूरी हो जाती। हवेली में वैभव की कोई कमी नहीं थी, और चंद्रकांत का बचपन इस ऐशो-आराम की गोद में पला।

लेकिन यह वैभव चंद्रकांत के स्वभाव को ढाल रहा था। वह सुंदर, चतुर और हंसमुख था, पर उसमें एक कमी थी—उसे मेहनत का मूल्य नहीं पता था। उसने कभी "ना" नहीं सुना। उसकी हर जिद पूरी होती थी, चाहे वह बाजार का सबसे मंहगा घोड़ा हो या कोई अनमोल आभूषण। विश्वनाथ, जो खुद मेहनत और संघर्ष की आग में तपकर इस मुकाम तक पहुंचे थे, ने अपने शुरुआती दिनों में कई बार अभाव और असफलताओं का सामना किया था। उन्होंने एक छोटे से व्यापारी के रूप में शुरुआत की थी, रात-दिन मेहनत कर, जोखिम उठाकर, और कई बार ठोकरें खाकर यह साम्राज्य खड़ा किया था। लेकिन चंद्रकांत का नजरिया उनके पिता से बिल्कुल उलट था। वह मानता था कि धन और सुख उसके जन्मसिद्ध अधिकार हैं।

जैसे-जैसे विश्वनाथ की उम्र ढलने लगी, उनके मन में एक गहरी चिंता ने जन्म लिया। उनका व्यापारिक साम्राज्य विशाल था, पर उसे संभालने वाला कोई नहीं था। चंद्रकांत, जो अब एक युवा बन चुका था, न तो व्यापार में रुचि लेता था और न ही मेहनत करने को तैयार था। वह दिन-रात मित्रों के साथ मौज-मस्ती में डूबा रहता, बाजारों में धन लुटाता, और हवेली में ऐशो-आराम का जीवन जीता।

एक रात, जब सूर्यनगर की गलियां सन्नाटे में डूबी थीं और हवेली के दीपक मंद-मंद जल रहे थे, विश्वनाथ अपने कक्ष में अकेले बैठे थे। उनके सामने उनकी पुरानी लेखा-बही खुली थी, जिसमें उनके शुरुआती संघर्षों के निशान दर्ज थे। उनके मन में एक तूफान उठ रहा था। "मैंने यह सब अपने खून-पसीने से बनाया है," उन्होंने स्वयं से कहा। "पर क्या चंद्रकांत इसका मूल्य समझेगा? क्या वह इसे संभाल पाएगा, या मेरे बाद यह सब बिखर जाएगा?"

विश्वनाथ को यह स्पष्ट हो चुका था कि उनके लाड़-प्यार ने चंद्रकांत को जीवन की वास्तविकता से दूर कर दिया था। वह नहीं चाहते थे कि उनका बेटा एक आलसी और अकृतज्ञ व्यक्ति बने। गहन चिंतन के बाद, उन्होंने एक कठोर निर्णय लिया। "मुझे चंद्रकांत को मेहनत का महत्व सिखाना होगा," उन्होंने मन में ठाना, "चाहे इसके लिए मुझे कितना भी सख्त होना पड़े।"

अगली सुबह, विश्वनाथ ने चंद्रकांत को अपने कक्ष में बुलाया। वह कक्ष, जहां दीवारों पर पुरानी तलवारें और व्यापारिक उपलब्धियों के प्रतीक टंगे थे, उस दिन एक अलग ही माहौल में था। विश्वनाथ का चेहरा गंभीर था, और उनकी आवाज में एक अनोखी कठोरता थी।

"चंद्रकांत," उन्होंने कहा, "तुमने इस परिवार के लिए, इस व्यापार के लिए कुछ नहीं किया। तुम्हारा इस हवेली में कोई अधिकार नहीं। मैं चाहता हूं कि तुम अपनी मेहनत से धन कमाओ। जब तक तुम स्वयं कमाकर नहीं लाओगे, तुम्हें इस घर में दो वक्त का भोजन नहीं मिलेगा।"

चंद्रकांत हक्का-बक्का रह गया। उसने अपने पिता की ओर देखा, यह सोचकर कि शायद यह कोई मजाक है। लेकिन विश्वनाथ की आंखों में दृढ़ता थी। उन्होंने हवेली के सभी सदस्यों को बुलाकर स्पष्ट आदेश दिया, "कोई भी चंद्रकांत की मदद नहीं करेगा। उसे अपने दम पर जीविका कमानी होगी।"

चंद्रकांत को अपने पिता की बात क्षणिक गुस्सा लगी। उसने सोचा, "यह तो बस कुछ समय की बात है। पिताजी का गुस्सा ठंडा हो जाएगा।" उसने हवेली के अन्य सदस्यों की ओर रुख किया। उसकी मां सावित्री, चाचा-चाची, और नौकर—सभी उसे बहुत प्यार करते थे। चंद्रकांत ने अपनी मासूम मुस्कान के साथ उनसे धन मांगा। सावित्री ने आंसुओं को दबाते हुए, और बाकी लोग विश्वनाथ के आदेश को नजरअंदाज कर, उसे थोड़ा-थोड़ा धन दे दिया।

शाम को, चंद्रकांत ने वह धन लाकर अपने पिता को दिखाया। विश्वनाथ ने बिना कोई भाव दिखाए उस धन को ले लिया और उसे बाहर फेंकने का आदेश दिया। चंद्रकांत ने बिना किसी हिचक के ऐसा कर दिया। उसे भोजन मिल गया, और वह खुशी-खुशी अपने कक्ष में चला गया।

यह सिलसिला कई दिनों तक चला। चंद्रकांत रोज किसी न किसी से धन मांग लेता, उसे फेंक देता, और भोजन पा लेता। लेकिन धीरे-धीरे, हवेली के लोग थकने लगे। उनकी जेबें खाली होने लगीं, और वे चंद्रकांत से कन्नी काटने लगे। सावित्री, जो अपने बेटे की हालत देखकर दुखी थी, अब मजबूरी में चुप रहने लगी। चंद्रकांत को मिलने वाला धन कम होने लगा, और उसी अनुपात में उसका भोजन भी।

एक दिन ऐसा आया जब चंद्रकांत को हवेली में किसी ने एक पैसा भी नहीं दिया। सावित्री ने आंसुओं भरी आंखों से कहा, "बेटा, मेरे पास अब कुछ नहीं बचा। तुझे अपने पिता की बात माननी होगी।" चंद्रकांत के सामने अब कोई रास्ता नहीं था। उसकी भूख बढ़ती जा रही थी, और उसका गर्व टूट रहा था।

वह सूर्यनगर की गलियों में निकल पड़ा। गर्मी की तपती दोपहर थी, और उसकी रेशमी पोशाक पसीने से भीग चुकी थी। उसने पहली बार मेहनत करने का निर्णय लिया। एक स्थानीय व्यापारी ने उसे अपने गोदाम में अनाज की बोरियां उठाने का काम दे दिया। चंद्रकांत, जिसने कभी कोई भारी सामान नहीं उठाया था, उस दिन घंटों पसीना बहाता रहा। उसकी हथेलियों में छाले पड़ गए, और उसका शरीर थकान से चूर हो गया।

शाम ढलने तक, उसे कुछ सिक्के मिले। वह थका-हारा, धूल से सना, अपने पिता के पास पहुंचा। उसने कांपते हाथों से वे सिक्के विश्वनाथ के सामने रखे और कहा, "पिताजी, यह मैंने कमाया है। मुझे भोजन चाहिए।"

विश्वनाथ ने हमेशा की तरह कहा, "इसे फेंक दो।"

चंद्रकांत का चेहरा लाल हो गया। उसकी आंखों में आंसू और गुस्सा एक साथ उमड़ आए। उसने चिल्लाकर कहा, "पिताजी, मैंने इसके लिए दिनभर पसीना बहाया है! मेरी हथेलियां छिल गई हैं, मेरा शरीर टूट रहा है। आप एक क्षण में इसे फेंकने को कह रहे हैं?"

विश्वनाथ की आंखों में एक चमक उभरी। उन्होंने चंद्रकांत को गले से लगा लिया। उनकी आवाज में गर्व और राहत थी। "बेटा," उन्होंने कहा, "आज तुमने मेहनत के फल का महत्व समझ लिया। यह धन तुम्हारा है, और इसका सम्मान करना तुम्हारा कर्तव्य है। मैं जानता था कि हवेली के लोग तुम्हारी मदद कर रहे थे, और मैं यह भी जानता था कि एक दिन वे थक जाएंगे। आज तुमने अपने दम पर कमाया, और यही तुम्हारी असली जीत है।"

विश्वनाथ ने चंद्रकांत को अपने व्यापार की बागडोर सौंप दी। चंद्रकांत अब एक बदला हुआ इंसान था। उसने अपने पिता के संघर्षों को समझा और उनके व्यापार को नई ऊंचाइयों तक ले गया।

शिक्षा:- यह कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत ही वह कुंजी है जो जीवन की हर चुनौती को खोल सकती है। आज के समय में, खासकर संपन्न परिवारों में, बच्चों को धन और वैभव आसानी से मिल जाता है, जिसके कारण वे मेहनत के महत्व से अनजान रहते हैं। माता-पिता का यह दायित्व है कि वे अपने बच्चों को जीवन की वास्तविकता से अवगत कराएं और उन्हें मेहनत का मूल्य सिखाएं। धन तभी मूल्यवान है जब उसका सम्मान हो, और सम्मान तभी मिलता है जब वह मेहनत से कमाया जाए। मेहनत ही वह हथियार है जो मनुष्य को किसी भी परिस्थिति से बाहर निकाल सकता है। लक्ष्मी उसी घर में वास करती है जहां मेहनत का सम्मान होता है।

कहानी का शीर्षक:- परिश्रम का फल


गंगा के किनारे बसे भटपुर गांव में सुबह की पहली किरणें मिट्टी को सहलाती थीं। हवा में खेतों की सोंधी खुशबू तैरती, और दूर कहीं कोयल की कूक गूंजती। इस गांव में दो किसानों की कहानी थी—भैरोमल और रामप्रसाद। दोनों एक ही धरती पर खेती करते थे, मगर उनके जीवन की राहें जुदा थीं। भैरोमल के पास खेतों की भरमार थी, लेकिन उसका दिल आलस्य से भरा था। रामप्रसाद के पास सिर्फ मेहनत थी, जो उसकी सबसे बड़ी पूंजी थी। यह कहानी है परिश्रम की, जो न सिर्फ खेतों को हरा-भरा करती है, बल्कि इंसान के भाग्य को भी संवार देती है।

भैरोमल का घर गांव के सबसे ऊंचे टीले पर खड़ा था। लकड़ी की नक्काशीदार खिड़कियां और मिट्टी की मोटी दीवारें उसकी समृद्धि की गवाही देती थीं। नीचे दूर तक फैले उसके खेत हरे-भरे कालीन जैसे दिखते थे। मगर भैरोमल का मन उसकी संपत्ति की तरह खुला नहीं था। वह सुबह देर तक अपनी चारपाई पर पड़ा रहता, तंबाकू की चिलम सुलगाता, और नौकरों को ऊंची आवाज में हुक्म देता, "जाओ, खेतों को देखो! फसल तैयार है कि नहीं, जरा पता करो!" खुद वह कभी मेड़ पर कदम नहीं रखता। उसका शरीर भारी था, और मन और भी भारी—आलस्य से लदा।

उसके नौकर और मजदूर भी उसी के रंग में रंगे थे। वे खेतों में पहुंचते, हल को दो-चार बार घसीटते, और फिर आम के पेड़ों की छांव में बैठकर गप्पें मारने लगते। "अरे, भैरोमल को क्या फर्क? उसके पास तो खेतों की कमी नहीं!" एक मजदूर हंसते हुए कहता। खेतों में न समय पर खाद डाली जाती, न खरपतवार निकाला जाता। बीज बेतरतीब बिखेर दिए जाते, और नहर का पानी भी आधा-अधूरा पहुंचता। गेहूं की बालियां पतली और कमजोर उगतीं, धान के खेतों में खरपतवार ने जड़े जमा लीं। धीरे-धीरे भैरोमल की फसलें कम होने लगीं, और उसकी समृद्धि की चमक फीकी पड़ गई।

रातें अब भैरोमल के लिए लंबी होने लगी थीं। साहूकार का कर्ज बढ़ता जा रहा था, और उसकी आवाज कानों में चुभती थी, "भैरोमल, उधारी अब हद से ज्यादा हो गई। कर्ज नहीं चुकाया, तो खेत बिकवाने पड़ेगे!" भैरोमल चारपाई पर करवटें बदलता, उसका मन डर और शर्मिंदगी से भारी था। "क्या मैं सचमुच इतना नीचे गिर गया?" वह खुद से सवाल करता, मगर जवाब ढूंढने की हिम्मत उसमें नहीं थी। उसका गर्व अब टूट रहा था, और वह अकेलेपन में डूबता जा रहा था।

उसी गांव में, गंगा के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में रामप्रसाद रहता था। उसके पास न खेत थे, न नौकर। वह भैरोमल के कुछ खेत किराए पर लेकर खेती करता था। मगर उसका दिल मेहनत से लबालब था। सूरज उगने से पहले वह अपने पुराने हल को कंधे पर उठाता, पत्नी ममता और बच्चों को साथ लेता, और खेतों की ओर चल पड़ता। उसका चेहरा पसीने से भीगा होता, मगर आंखों में एक चमक थी—सपनों की चमक, जो मेहनत से हकीकत बनने को तैयार थी।

रामप्रसाद अपने मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता। वह खेतों को इतनी सावधानी से जोतता, मानो हर मिट्टी का कण उसका अपना हो। "देखो, भाइयों, अगर हम खेत को प्यार देंगे, तो खेत भी हमें प्यार देगा," वह मुस्कुराते हुए कहता, और उसकी आवाज में एक गर्मजोशी थी जो सबको जोश देती। उसके खेतों में खाद समय पर डाली जाती, खरपतवार नियमित निकाला जाता, और बीज इतनी सटीकता से बोए जाते कि हर पौधा अपनी पूरी ताकत से उगता। गंगा की नहर से पानी लाने के लिए वह खुद नहर की मरम्मत करता, ताकि एक बूंद भी बेकार न जाए।

रामप्रसाद का परिवार उसका सबसे बड़ा सहारा था। ममता खेतों में खरपतवार निकालती, बच्चे छोटे-मोटे कामों में हाथ बंटाते। शाम को जब सूरज ढलता, तो वे खेतों की मेड़ पर बैठकर हंसी-मजाक करते। ममता कहती, "राम, आज खेतों में गेहूं की बालियां कितनी सुंदर दिख रही थीं, मानो सोना लहरा रहा हो!" रामप्रसाद हंसता, "हां, ममता, ये सोना हमारी मेहनत का है।" उनके चेहरों पर थकान तो होती, मगर संतोष की मुस्कान उसे ढक लेती। उनके खेत लहलहाते थे—गेहूं की सुनहरी बालियां हवा में लहरातीं, और धान के पौधे इतने घने थे कि खेत हरे कालीन जैसे दिखते।

रामप्रसाद की मेहनत रंग लाई। वह हर साल अच्छी फसल बचा लेता। किराया चुकाने और घर चलाने के बाद भी उसके पास कुछ धन बच जाता। उसने धीरे-धीरे एक छोटा-सा खेत खरीदा, और फिर उसकी मेहनत ने उसे और आगे बढ़ाया। गांव वाले उसकी तारीफ करते, "रामप्रसाद ने तो मिट्टी को सोना बना दिया!" उसका दिल गर्व से नहीं, बल्कि संतोष से भरा था। वह जानता था कि उसकी मेहनत ही उसकी असली दौलत है।

एक दिन गांव में खबर फैली कि भैरोमल को अपने खेत बेचने पड़ रहे हैं। साहूकार का कर्ज अब असहनीय हो चुका था। रामप्रसाद को यह सुनकर दुख हुआ, मगर उसने एक मौका भी देखा। वह भैरोमल के घर पहुंचा। भैरोमल अपनी चारपाई पर उदास बैठा था, उसका चेहरा थकान और निराशा से मुरझाया था।

''भैरोमल जी, मैंने सुना कि आप अपने खेत बेचना चाहते हैं," रामप्रसाद ने नम्रता से कहा, उसकी आवाज में सहानुभूति थी। "अगर आप बुरा न मानें, तो मैं आपके खेत खरीदना चाहता हूं। मैं आपको उचित दाम दूंगा।"

भैरोमल ने आश्चर्य और थोड़े गुस्से से उसकी ओर देखा। "रामप्रसाद, तुम्हारे पास इतना धन कहां से आया? तुम तो मेरे ही खेतों पर किराए की खेती करते हो। किराया देने के बाद तुम्हारे पास क्या बचता है? किसी ने तुम्हें उधार दिया है क्या?" उसकी आवाज में जलन और अविश्वास था।

रामप्रसाद ने शांत स्वर में जवाब दिया, "नहीं, भैरोमल जी, मुझे किसी ने उधार नहीं दिया। जो धन मेरे पास है, वह मेरी मेहनत का है। आप और मैं एक ही मिट्टी पर खेती करते हैं, मगर फर्क इतना है कि आप अपने नौकरों को 'जाओ' कहते हैं, और मैं अपने साथियों को 'आओ' कहता हूं। आप दूसरों पर भरोसा करते हैं, मगर मैं अपने खेतों को अपनी आंखों से देखता हूं, अपने हाथों से जोतता हूं। मेरी मेहनत ने मुझे यह धन दिया है।"

रामप्रसाद की बातें भैरोमल के सीने में तीर की तरह चुभीं। पहले तो उसके चेहरे पर शर्मिंदगी छाई, फिर उसकी आंखों में एक नई चमक जगी। वह समझ गया कि उसकी असफलता का कारण उसका आलस्य था। उसने कुछ खेत रामप्रसाद को बेच दिए और साहूकार का कर्ज चुका दिया। मगर इस बार उसने ठान लिया कि वह अपनी गलतियों को सुधारेगा।

भैरोमल ने बचे हुए खेतों में मेहनत शुरू की। सुबह वह सूरज के साथ उठता, अपने हल को कंधे पर रखता, और खेतों की ओर चल पड़ता। उसने अपने मजदूरों को भी प्रेरित किया। "आओ, भाइयों, हम सब मिलकर इन खेतों को फिर से हरा-भरा करेंगे!" वह जोश से कहता। उसकी मेहनत रंग लाई। खेत फिर से लहलहाने लगे, और उसका घर खुशियों से भर गया। भैरोमल का चेहरा अब गर्व और संतोष से चमकता था। वह समझ चुका था कि मेहनत ही वह जादू है, जो सब कुछ बदल सकता है।

कहानी का शीर्षक:- भगवान पर भरोसा 


कहानी:- प्राचीन भारत के सुविख्यात नगर इंद्रप्रस्थ में एक ज्ञानी ब्राह्मण और उनकी धर्मशील पत्नी निवास करते थे। यद्यपि वे वैभव में नहीं, किन्तु संतोष में पूर्ण थे। उनके जीवन का आधार न सोने-चाँदी की संपत्ति थी, न राजकीय कृपा, अपितु श्रद्धा, तप, और आचरण की निर्मलता। वे नित्यप्रति प्रभु की उपासना करते, यज्ञाग्नि में आहुति देते और एकमात्र संतान—बालक उदयन को अपने आचरण से धर्म का सार सिखाते। उदयन अभी मात्र सात वर्ष का था, पर उसके भीतर एक प्रकार की सन्निपातिनी शांति थी—जैसे वह बालक न हो, किसी पूर्वजन्म का तपस्वी हो जो फिर से किसी शिक्षा हेतु पृथ्वी पर भेजा गया हो।

उसके माता-पिता उसे शास्त्रों के श्लोक रटवाने की अपेक्षा धर्म को जीने का अभ्यास कराते थे। जब वे दीपक जलाकर अन्न का प्रथम भाग प्रभु को अर्पित करते, उदयन नन्हे हाथ जोड़कर उसी नीरव श्रद्धा से नत हो जाता, जैसे वह दृश्य नहीं, अनुभूति देख रहा हो। एक दिन की बात है—राजा युधिष्ठिर के आदेशानुसार नगर के सर्वश्रेष्ठ बालकों का चयन एक विशेष शिक्षण सभा हेतु किया गया। उदयन का चयन भी हुआ। जब वह प्रातःकाल आश्रम से निकलने को हुआ, उसकी माँ ने उसके मस्तक पर हाथ रखकर कहा—“बेटा, तू ज्ञान अर्जित करने जा रहा है, पर यदि कहीं कोई संकट आए, और कोई भी साथ न हो, तो ईश्वर को पुकारना—पर कभी शिकायत मत करना, केवल भरोसा रखना।”

उसका रथ राजधानी से दूर एक वन-पथ पर था, जहाँ प्रतियोगिता हेतु अन्य विद्यार्थियों संग उसे जाना था। मार्ग में डाकुओं के एक गिरोह ने रथ पर आक्रमण किया। अन्य बालक भय से भाग निकले, किंतु उदयन वहीं खड़ा रह गया—न भय, न प्रतिकार, बस मौन। डाकुओं ने उसका धन और सामग्री छीन ली, उसे बाँधा और कष्ट देने का प्रयास किया, पर वह बालक आँखें मूँदे खड़ा रहा। डाकुओं में से एक ने चिल्लाकर पूछा, “क्यों नहीं डरता तू? मृत्यु पास है!” उदयन ने आँखें खोलीं और इतना ही कहा, “डर तो तब होता जब भगवान पास न होते।”

डाकू हँसे, परंतु उसी क्षण गगन में घनघोर मेघ घिर आए, मूसलधार वर्षा आरंभ हो गई। पास ही से गुजरता एक सैनिक दल, जो राजपथ की रक्षा हेतु निकला था, उस ओर आकृष्ट हुआ। कुछ ही पलों में डाकू गिरफ़्तार हो गए और उदयन को मुक्त कर राजधानी लाया गया। जब राजा को यह समाचार प्राप्त हुआ कि एक बालक संकट में भी अविचल खड़ा रहा और उसने प्रभु का नाम लिया, तो उन्होंने उसे धैर्य, निष्ठा और श्रद्धा का प्रतीक मानते हुए राजसभा में बुलाया।

राजसभा में युधिष्ठिर ने पूछा, “बालक! तुझे भय नहीं लगा?”
उदयन ने विनयपूर्वक उत्तर दिया, “राजन्! मेरी माँ ने सिखाया है कि जो हमें जीवनभर देता आया हो, उस पर विपत्ति में भी विश्वास रखना चाहिए—न कि संदेह। शिकायत उस पर नहीं करते, जिस पर भरोसा किया गया हो।”
राजा मौन हो गए। पूरी सभा स्तब्ध थी—उस बालक की यह बात केवल एक उत्तर नहीं थी, एक युग-स्मृति थी।

इस घटना के पश्चात न केवल उदयन सम्मानित हुआ, अपितु राजा ने इंद्रप्रस्थ में एक विशेष संस्था की स्थापना की—जहाँ पालकों को यह शिक्षा दी जाती कि यदि वे संतान को केवल ज्ञान ही नहीं, जीवन भी देना चाहते हैं, तो पहले उन्हें अपने जीवन को श्रद्धा और अनुशासन में ढालना होगा। क्योंकि उदयन जैसा साहसी, श्रद्धावान और संतुलित बालक केवल पाठशालाओं में नहीं बनता—वह घर की गोद, रसोई की सुगंध, और प्रभु के आगे झुके हुए माथों से बनता है।

शिक्षा:- सच्चे संस्कार वाणी से नहीं, माता-पिता के जीवन की निष्ठा और श्रद्धा से संतान में उतरते हैं। ईश्वर पर भरोसा तब जन्मता है जब बच्चे घर में धर्म को केवल सुना नहीं, देखा और जिया हुआ पाते हैं। विपत्ति में डटे रहना और शिकायत से दूर रहना वही सीख पाता है जिसने भीतर से भक्ति को ग्रहण किया हो। जो भगवान पर भरोसा रखना सीख लेता है, उसके भीतर कभी भय व भ्रम नहीं ठहरते। और वही बालक एक दिन समाज का दीप, और राष्ट्र का आधार बनता है।

रामप्रसाद भी अपने नए खेतों में मेहनत करता रहा। उसका छोटा-सा खेत अब बड़े खेतों में बदल चुका था, और उसकी झोपड़ी एक पक्के मकान में तब्दील हो गई थी। मगर उसका दिल वही था—मेहनत और संतोष से भरा। वह और उसका परिवार हर शाम खेतों की मेड़ पर बैठकर सूरज को ढलते देखते, और उनके चेहरों पर वही पुरानी मुस्कान होती।

शिक्षा: यह कहानी हमें सिखाती है कि परिश्रम ही वह शक्ति है, जो इंसान के भाग्य को बदल सकती है। भैरोमल का आलस्य उसे गरीबी की ओर ले गया, जबकि रामप्रसाद की मेहनत ने उसे समृद्धि दी। मेहनत न सिर्फ खेतों को उपजाऊ बनाती है, बल्कि इंसान के मन को भी संतोष और आत्मविश्वास से भर देती है। जो लोग दूसरों पर निर्भर रहते हैं, वे अक्सर असफल होते हैं, मगर जो खुद मेहनत करते हैं और दूसरों को साथ लेकर चलते हैं, वे हमेशा आगे बढ़ते हैं। परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है—यह वह बीज है, जो सफलता की फसल उगाता है।

कहानी का शीर्षक:- मन के भाव


कहानी: गर्मियों की तपती दोपहर थी। एक शिष्य अपने गुरु से सप्ताहभर की छुट्टी लेकर अपने गांव जाने के लिए निकला। वह पैदल यात्रा कर रहा था, और रास्ता लंबा और थका देने वाला था। चलते-चलते जब धूप और थकान ने उसे बेहाल कर दिया, तो उसने रास्ते में एक पुराना कुआं देखा।

वह तुरंत उस कुएं की ओर बढ़ा। प्यास से गला सूख रहा था, इसलिए उसने कुएं से पानी निकाला और अपने गले को तर किया। पानी इतना मीठा और ठंडा था कि वह एक पल के लिए अपनी सारी थकान भूल गया। शिष्य को ऐसा महसूस हुआ जैसे यह पानी किसी अमृत के समान हो।

पानी की उस ताजगी और मिठास ने उसके मन में गुरुजी का ख्याल ला दिया। उसने सोचा, “गुरुजी को भी यह जल पिलाऊं, तो उन्हें कितना अच्छा लगेगा।” अपने गुरु के प्रति प्रेम और श्रद्धा से भरकर उसने अपनी मशक (चमड़े का बना पानी रखने का बर्तन) में वह जल भर लिया और आश्रम की ओर लौट पड़ा।

आश्रम पहुंचकर वह सीधे गुरुजी के पास गया और बोला, “गुरुजी, रास्ते में मुझे यह कुआं मिला। इसका पानी इतना मीठा और ठंडा है कि मैंने सोचा आपको भी यह पिलाना चाहिए।”

गुरुजी ने मुस्कुराते हुए मशक हाथ में ली और पानी पिया। कुछ देर शांत रहे, फिर बोले, “वाकई, यह पानी तो गंगाजल के समान है। इतना मीठा और शीतल जल मैंने पहले कभी नहीं पिया।”

यह सुनकर शिष्य का हृदय प्रसन्न हो उठा। उसने गुरुजी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की और आज्ञा लेकर अपने गांव चला गया।

थोड़ी देर बाद, आश्रम में एक और शिष्य आया। उसने देखा कि गुरुजी के पास मशक रखी हुई है। उसने जिज्ञासा से पूछा, “गुरुजी, क्या मैं भी यह जल पी सकता हूं?” गुरुजी ने मशक उसकी ओर बढ़ा दी।

जैसे ही शिष्य ने जल का घूंट भरा, उसने तुरंत उसे बाहर थूक दिया और बोला, “गुरुजी, यह पानी तो कड़वा है और इसमें से दुर्गंध आ रही है। यह तो बिल्कुल भी शीतल नहीं है। आपने इस पानी की इतनी प्रशंसा क्यों की?”

गुरुजी मुस्कुराए और बोले, “बेटा, इस जल में मिठास और शीतलता हो न हो, लेकिन इसे लाने वाले के मन में जरूर थी। जब वह शिष्य यह जल लेकर आया, तो उसके मन में मेरे प्रति अपार प्रेम था। उसने यह पानी इस भावना के साथ लाया कि मुझे प्रसन्नता होगी। अगर मैं उसे यह कह देता कि पानी कड़वा है, तो उसका मन दुखी हो जाता। जल तो बस एक साधन था; उसके प्रेम और समर्पण की भावना मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण थी।”

गुरुजी ने आगे कहा, “हो सकता है कि जब पानी कुएं से भरा गया हो, तब वह मीठा और शीतल रहा हो। परंतु मशक साफ न होने या रास्ते की गर्मी के कारण पानी की ताजगी खत्म हो गई। लेकिन इससे शिष्य के प्रेम और भावनाओं का महत्व कम नहीं होता। हमें हमेशा दूसरों के प्रयास और उनकी नीयत को देखना चाहिए, न कि सिर्फ परिणाम को।”

शिक्षा: यह कहानी हमें सिखाती है कि हर कार्य के पीछे की भावना और नीयत सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। किसी की मेहनत या समर्पण को केवल परिणाम से नहीं तौलना चाहिए। साथ ही, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना और उनके मन को दुखी करने से बचना भी एक महान गुण है। हर बुराई में अच्छाई खोजने और दूसरों के प्रयास की सराहना करने का गुण हमें अपने जीवन में अपनाना चाहिए।

कहानी का शीर्षक:-कर्म और भाग्य


कहानी: एक छोटे से शहर में एक चाट वाला था, जिसका नाम मोहन था। उसका ठेला हमेशा उसी गली में रहता, और उसका चेहरा हमेशा मुस्कान से भरा रहता। जो लोग भी चाट खाने आते, उन्हें ऐसा महसूस होता जैसे वह उनका ही इंतजार कर रहा हो। मोहन का स्वभाव बहुत ही मिलनसार था और वह किसी भी विषय पर घंटों बात कर सकता था। कई बार जब लोग जल्दी में होते, तो वह उन्हें कहता, "भैया, थोड़ी देर बैठो, बात कर लें, चाट तो खा ही लोगे।" लेकिन उसकी बातें कभी खत्म नहीं होती थीं।

एक दिन मैं चाट खाने गया और इस बार मोहन के साथ एक खास बात करने का मन था। मैंने सोचा, "क्यों न आज उसकी सोच को समझा जाए, शायद वह कुछ नया सिखा सके।" तो मैंने एक सवाल पूछा, "मोहन भाई, तुम क्या समझते हो, आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?"

मोहन ने थोड़ी देर सोचा और फिर एक मुस्कान के साथ जवाब दिया, "अरे भाई, तुमने तो बड़ा गहरा सवाल पूछ लिया!" फिर उसने मुझसे एक सवाल किया, "तुम्हारे पास किसी बैंक में लॉकर है?"

मैंने कहा, "हां, है तो।"

मोहन हंसते हुए बोला, "ठीक है, तो सोचो कि तुम्हारे पास जो चाभी है, वह है परिश्रम और मेहनत। और बैंक के मैनेजर के पास जो चाभी है, वह है भाग्य। जब तक दोनों चाभियाँ साथ नहीं लगतीं, तब तक लॉकर नहीं खुल सकता।"

उसकी बात सुनकर मुझे समझ में आया। वह कह रहा था कि परिश्रम हमारी चाभी है और भाग्य दूसरी चाभी। हमें अपनी चाभी, यानी मेहनत, लगाते रहना चाहिए, क्योंकि हम नहीं जानते कि ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगाकर हमें सफलता की कुंजी दे दे।

मोहन ने आगे कहा, "तुम एक कर्मयोगी हो, और भगवान एक मैनेजर। तुम अपनी चाभी लगाए बिना अगर बैठे रहोगे, तो ताला कभी नहीं खुलेगा। कभी-कभी भगवान अपनी चाभी लगाकर ताला खोलता है, लेकिन अगर तुम्हारी चाभी न लगी हो, तो तुम दरवाजा खोलने से रह जाओगे।"

इस कहानी से जो शिक्षा मिली वह यह थी कि कर्म और भाग्य दोनों का साथ जरूरी है। भाग्य तो अपनी जगह है, लेकिन कर्म बिना कुछ नहीं होता। हमें मेहनत करनी चाहिए, क्योंकि हमारी मेहनत और भाग्य का मिलन ही हमें सफलता की ओर ले जाता है। अगर हम सिर्फ भाग्य के भरोसे बैठे रहेंगे, तो कुछ हासिल नहीं होगा।

इसलिए, कर्म और भाग्य दोनों का संतुलन जरूरी है, और हमें दोनों में से किसी को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

कहानी का शीर्षक:- आनंदित रहने की कला


कहानी: बहुत समय पहले की बात है, एक राजा अपने राज्य की तमाम जिम्मेदारियों से परेशान था। उसने सोचा कि अब वह राजपाट छोड़कर अपनी ज़िन्दगी को ईश्वर की खोज में समर्पित कर देगा। उसका पुत्र अभी छोटा था, और राजा को यह चिंता थी कि उसे राज्य का कोई योग्य वारिस नहीं मिला था। वह गुरु के पास गया और अपनी समस्याएँ बताई, साथ ही यह भी कहा कि जब भी उसे ऐसा कोई पात्र व्यक्ति मिलेगा, जो राज्य चलाने के सभी गुण रखता हो, वह अपना राजपाट छोड़कर ईश्वर की भक्ति में लग जाएगा।

गुरु ने राजा की बातें सुनकर कहा, "राज्य की जिम्मेदारी क्यों न मुझे सौंप दो? क्या तुम्हें मुझसे ज्यादा योग्य और सक्षम कोई व्यक्ति मिलेगा?"

राजा खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया और गुरु को राज्य का प्रभार सौंप दिया। फिर गुरु ने पूछा, "अब तुम क्या करोगे?"

राजा बोला, "अब मैं राज्य के खजाने से थोड़ा पैसा लूँगा, ताकि मेरा बाकी जीवन आराम से चल सके।"

गुरु हंसते हुए बोले, "अब खजाना तो मेरा है, तुम एक पैसा भी नहीं ले सकते।"

राजा थोड़ी देर सोचने के बाद बोला, "फिर ठीक है, मैं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूँगा, उसी से जीवन का खर्चा चला लूंगा।"

गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा, "अगर तुम्हें नौकरी ही करनी है, तो मेरे यहाँ एक खाली नौकरी है। क्या तुम मेरे यहाँ नौकरी करना चाहोगे?"

राजा ने जवाब दिया, "कोई भी नौकरी हो, मैं करने को तैयार हूँ।"

गुरु ने कहा, "मेरे यहाँ राजा की नौकरी खाली है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए यह नौकरी करो और राज्य के खजाने से हर महीने अपनी तनख्वाह लेते रहना।"

एक साल बाद गुरु लौटकर आया और देखा कि राजा बेहद खुश था। वह राज्य का काम भी अच्छे से कर रहा था और साथ ही अध्यात्म में भी व्यस्त था। अब उसकी कोई चिंता नहीं थी।

शिक्षा: इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि असल में परिवर्तन नहीं हुआ था। राज्य वही था, राजा वही था, काम वही था; फर्क सिर्फ इतना था कि राजा का दृष्टिकोण बदल गया था। उसने यह सोच लिया था कि वह ईश्वर की नौकरी कर रहा है। जब हम अपने दृष्टिकोण को बदलते हैं और यह मानते हैं कि हम जो भी कार्य कर रहे हैं, वह ईश्वर की सेवा है, तो हम हर परिस्थिति में संतुष्ट और खुश रह सकते हैं।

इसी तरह, जीवन में अगर हम अपने कार्यों को "ईश्वर की नौकरी" समझकर करें, तो हर समस्या से ऊपर उठकर हम आनंदित रह सकते हैं।

कहानी का शीर्षक:-कर्म पूजा 


कहानी:- अवध के राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को उनके नीतिपूर्ण और धार्मिक आचरण के लिए जाना जाता था। उनका हृदय दया और करुणा से परिपूरित था। वह अपनी प्रजा के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को अत्यधिक गंभीरता से निभाते थे और उनका हमेशा यही प्रयास रहता था कि उनकी प्रजा सुख-शांति से रहे। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह अक्सर रात के समय वेश बदलकर नगर की गलियों में घूमने निकल जाते थे, ताकि वह अपनी प्रजा के जीवन की वास्तविक स्थिति जान सकें और यह सुनिश्चित कर सकें कि राज्य में हर व्यक्ति सुखी है।

दीपावली का त्योहार आया और समस्त नगर दीपों से जगमग हो उठा। बच्चों ने आतिशबाजी की, लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएँ दे रहे थे, और हर तरफ उल्लास का माहौल था। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह भी अपनी प्रजा की खुशहाली देखकर अत्यंत प्रसन्न थे। उन्हें अपने राज्य की समृद्धि का असली प्रतीक अपनी प्रजा की खुशी ही नजर आती थी। वह दीपावली की रात भी नगर भ्रमण के बाद महल की ओर लौट रहे थे, तभी उनकी नज़र एक अंधेरी और टूटी-फूटी झोपड़ी पर पड़ी। झोपड़ी का दरवाजा आधा खुला हुआ था। राजा की जिज्ञासा बढ़ी और वह धीरे-धीरे झोपड़ी की ओर बढ़े।

जब राजा दरवाजे के पास पहुँचे, तो भीतर एक वृद्ध व्यक्ति दीपक के पास बैठे थे। उनका चेहरा चिंता और थकान से ढका हुआ था, लेकिन दीपक की हल्की सी रोशनी उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति प्रदान कर रही थी। वृद्ध व्यक्ति ने राजा से कहा, "महाशय, मैं कब से आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मैं वृद्ध हो गया हूँ और अकेले पूजा करने में असमर्थ हूँ। कृपया, मेरी सहायता करें।" राजा महेन्द्र प्रताप सिंह थोड़ी देर के लिए असमंजस में पड़ गए। उन्हें यह चिंता थी कि अगर वह यहां रुकते हैं, तो महल पहुंचने में देर हो जाएगी और पूजा का शुभ मुहूर्त भी निकल जाएगा। लेकिन वृद्ध व्यक्ति के पुनः निवेदन पर, राजा ने अंततः रुकने का निर्णय लिया और उस वृद्ध व्यक्ति के साथ बैठकर पूजा करने लगे।

राजा ने वृद्ध के कहे अनुसार पूजा की थाली से रोली और चावल उठाए और आँखें बंद कर लीं। जैसे ही राजा ने अपनी आँखें खोलीं, तो वह हैरान रह गए। सामने उनका दृश्य पूरी तरह से बदल चुका था। वृद्ध व्यक्ति अब वहां नहीं थे, बल्कि उनके स्थान पर साक्षात कुबेर जी और लक्ष्मी जी विराजमान थे। राजा ने तुरंत उनके मस्तक पर रोली और चावल लगा दिए और गहरी श्रद्धा से उन्हें प्रणाम किया। कुबेर जी ने राजा से कहा, "राजन! जिस राज्य का शासक अपनी प्रजा की इच्छाओं और आवश्यकताओं का ध्यान उसी तरह रखता है जैसे वह अपने परिवार का ध्यान रखता है, उस राज्य में कभी कोई कमी नहीं हो सकती।" फिर लक्ष्मी जी ने भी आशीर्वाद देते हुए कहा, "राजन! तुम्हारा प्रजा के प्रति प्रेम देखकर मैं प्रसन्न हूँ। जहाँ का शासक प्रजा प्रेमी होता है, वह राज्य हमेशा धन और समृद्धि से भरा रहता है। इसी कारण मैं लंबे समय से तुम्हारे राज्य में निवास कर रही हूँ। जब तक तुम्हारे राज्य में प्रजा प्रेमी शासक रहेंगे, तब तक मैं यहाँ मौजूद रहूँगी।"

राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को यह अनुभव उनके जीवन का सबसे बड़ा और सबसे अमूल्य उपहार साबित हुआ। यह घटना उनके मन में गहरी छाप छोड़ गई, और उन्होंने अपने शासन में इस सिखाए गए मूल्य को हमेशा बनाए रखा। वह अपनी प्रजा के सुख और भलाई के लिए और अधिक समर्पित हो गए।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि सच्चे नेता वही होते हैं जो अपनी प्रजा के सुख और समृद्धि का उतना ही ध्यान रखते हैं जितना वह अपने परिवार का रखते हैं। जब शासक अपनी प्रजा के प्रति सच्चा प्रेम और चिंता दिखाता है, तो उस राज्य में समृद्धि और खुशहाली का वास होता है। हमें हमेशा अपने कर्तव्यों को जिम्मेदारी से निभाना चाहिए और अपने कार्यों में निस्वार्थ भाव से सेवा की भावना रखनी चाहिए। इस प्रकार, कर्म पूजा का सही अर्थ यही है कि हम अपने कर्मों के माध्यम से अपने समाज और प्रजा की भलाई के लिए काम करें।

कहानी का शीर्षक:- प्रगति का रास्ता


कहानी: एक विद्वान किसी गाँव से गुजर रहा था, और उसे अचानक याद आया कि उसके बचपन का मित्र इसी गाँव में रहता है। उसने सोचा कि क्यों न उससे मिलकर पुरानी यादें ताज़ा की जाएं। जब वह मित्र के घर पहुँचा, तो उसने देखा कि मित्र गरीबी और दरिद्रता की चादर में लिपटा हुआ है। उसके पास दो जवान भाई भी थे, जो कठिनाई से अपने जीवनयापन की कोशिश कर रहे थे। उस दिन बातचीत करते-करते शाम हो गई, और विद्वान ने देखा कि मित्र के दोनों भाई घर के पीछे फली के पेड़ से फलियाँ तोड़कर बेचने के लिए निकले। उन्होंने कुछ पैसे कमाए और उस पैसे से दाल और आटा खरीदा, लेकिन मात्रा इतनी कम थी कि तीनों भाइयों और विद्वान के लिए भोजन में कमी रह गई।

जब भोजन करने का समय आया, तो एक भाई ने उपवास का बहाना बनाया, जबकि दूसरे ने खराब पेट का। इस स्थिति को देखकर विद्वान का मन भारी हो गया। केवल मित्र ने विद्वान के साथ भोजन करने की हिम्मत जुटाई। रात भर विद्वान की आँखों में नींद नहीं आई। वह सोचने लगा कि उसके मित्र की दरिद्रता को कैसे दूर किया जाए। चुपके से वह उठकर एक कुल्हाड़ी लेकर आंगन में गया और फली के पेड़ को काट दिया। वह जानता था कि इस पेड़ पर निर्भरता ने मित्र और उसके भाइयों को आलसी बना दिया था। विद्वान रातों-रात वहां से चला गया, बिना यह सोचे कि उसके इस कृत्य का गाँव में क्या असर होगा।

सुबह होते ही गाँव में हंगामा मच गया। लोगों ने विद्वान की निंदा शुरू कर दी कि वह किस प्रकार का निर्दयी मित्र है, जिसने तीन भाइयों का रोज़ी-रोटी का एकमात्र सहारा एक झटके में समाप्त कर दिया। तीनों भाइयों की आंखों में आँसू थे और वे विद्वान की निर्दयता के खिलाफ आवाज उठाने लगे। 2-3 साल बीत गए, और विद्वान को फिर से उसी गाँव की ओर जाना था। वह डरते-डरते गाँव में कदम रखा, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उसके मित्र की झोपड़ी की जगह एक भव्य कोठी खड़ी थी। जैसे ही तीनों भाई बाहर आए, उन्होंने विद्वान को देखकर रोते हुए उसके पैरों पर गिर पड़े।

भाइयों ने कहा, “यदि तुमने उस दिन फली का पेड़ न काटा होता, तो हम आज इतने समृद्ध न हो पाते। हमने अपनी मेहनत से जो कुछ भी हासिल किया, वह उसी दिन से शुरू हुआ, जब हमें अपनी मेहनत पर निर्भर रहना पड़ा।” उन्होंने विद्वान को बताया कि जब वे सहारे पर निर्भर थे, तब तक वे आलसी और दरिद्र बने रहे। लेकिन उस दिन फली के पेड़ के कटने ने उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया। विद्वान ने यह समझ लिया कि कभी-कभी हमें अपने सहारे को खत्म करने के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता होती है, ताकि हम अपनी पूरी क्षमता को पहचान सकें।

शिक्षा: आत्मनिर्भरता और संघर्ष ही प्रगति के सच्चे रास्ते हैं। जब हम अपनी स्थिति से संतुष्ट रहते हैं और किसी सहारे पर निर्भर रहते हैं, तो हम आलसी हो जाते हैं और विकास की ओर नहीं बढ़ते। जीवन में हमेशा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और जब हम अपने आराम क्षेत्र से बाहर निकलते हैं, तभी हम अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं। सच्ची प्रगति उसी दिन से शुरू होती है, जब हम अपने सहारे को तोड़कर अपने प्रयासों पर भरोसा करते हैं। यही कारण है कि महान नेताओं और महापुरुषों ने अपने-अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलकर असाधारण सफलताएं प्राप्त कीं।

कहानी का शीर्षक:- मान्यताओं की मानसिकता


कहानी: हारवर्ड विश्वविद्यालय के एक मनोवैज्ञानिक ने एक अनूठा प्रयोग किया। वह अपनी कक्षा में एक बंद बोतल लेकर आया, जिसमें अमोनिया गैस होने का दावा किया। कक्षा में पचास विद्यार्थी बैठे थे, और उसने उन सभी को बताया कि वह एक प्रयोग करना चाहता है। जैसे ही वह बोतल का ढक्कन खोलेगा, अमोनिया गैस की गंध फैलनी शुरू हो जाएगी। उसका उद्देश्य यह था कि वह देखे कि गंध कमरे की अंतिम पंक्ति तक पहुँचने में कितना समय लेती है। उसने विद्यार्थियों को निर्देश दिया कि जैसे ही उन्हें गंध महसूस हो, वे हाथ ऊपर उठा दें।

विद्यार्थी ध्यान से बैठ गए, और मनोवैज्ञानिक ने बोतल खोली। बोतल खोलते ही उसने अपनी नाक पर रुमाल रख लिया, जैसे कि वह खुद को अमोनिया गैस से बचा रहा हो। कुछ ही क्षणों में, पहली पंक्ति के एक विद्यार्थी ने हाथ उठाया, फिर दूसरे ने, फिर तीसरे ने, और यह सिलसिला जारी रहा। पंद्रह सेकेंड के भीतर पूरी कक्षा के विद्यार्थियों ने हाथ उठा दिए। पर असलियत यह थी कि उस बोतल में अमोनिया गैस थी ही नहीं—वह बोतल खाली थी।

यह घटना इस बात का प्रमाण है कि मान्यताएँ कितनी शक्तिशाली होती हैं। जब लोगों ने मान लिया कि गैस है, तो उन्होंने उसकी गंध महसूस करना शुरू कर दिया, भले ही वास्तविकता में कुछ भी नहीं था। यह सब उनकी धारणा का परिणाम था।

इसी प्रकार का एक अन्य उदाहरण एक अस्पताल का है, जहाँ एक मरीज ने मजाकिया अंदाज में संतरे का रस पेशाब की जांच के लिए दी गई बोतल में डाल दिया। जब नर्स उस बोतल को लेने आई, तो उसने बोतल में अजीब सा रंग देखा। मरीज ने मजाक करते हुए कहा, "इसका रंग अजीब है, मैं इसे फिर से शरीर से निकाल दूँगा, तो ठीक हो जाएगा," और वह बोतल का रस पी गया। नर्स यह सोचकर बेहोश हो गई कि मरीज अपनी ही पेशाब पी रहा है, जबकि वह सिर्फ संतरे का रस था।

इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि मान्यताएँ वास्तविकता पर हावी हो सकती हैं। हम जो मान लेते हैं, वही हमारी सच्चाई बन जाती है। चाहे वह शरीर से संबंधित हो, सीमाओं से संबंधित हो, या क्षुद्रताओं से—जो भी हम मान लेते हैं, वही हमारी पहचान बन जाती है।

निष्कर्ष: यह कहानी हमें यह सिखाती है कि हमारी मान्यताएँ हमारे जीवन को आकार देती हैं। यदि हम किसी बात को सत्य मान लेते हैं, चाहे वह वास्तविकता से परे हो, वह हमारे जीवन में वास्तविक प्रतीत होने लगती है। इसलिए हमें अपनी मान्यताओं का चयन बुद्धिमानी से करना चाहिए, क्योंकि वे हमारे जीवन को नियंत्रित करती हैं।

कहानी का शीर्षक:- अनोखा मुक़दमा


कहानी: विश्व का सबसे अनोखा मुकदमा और ऐसे मुकदमे को मैं हर घर मे देखना भी चाहता हूं.. न्यायालय में एक अनोखा मुकद्दमा आया, जिसने सभी को झकझोर दिया। अक्सर अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के मुकदमे आते ही रहते हैं। मगर ये मामला बहुत ही अलग किस्म का था। 

एक 70 साल के बूढ़े व्यक्ति ने, अपने 80 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा किया था। मुकद्दमे कुछ इस प्रकार का था कि "मेरा 80 साल का बड़ा भाई, अब बूढ़ा हो चला है, इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता। मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 102 साल की मां की देखभाल कर रहा है। मैं अभी ठीक हूं, इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय। 

न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया। न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग 15-15 दिन रख लो। मगर कोई टस से मस नहीं हुआ, बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ। अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी है या मैं उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई को दे दो। 

छोटा भाई कहता कि पिछले 40 साल से अकेले ये सेवा किये जा रहा है, आखिर मैं अपना कर्तव्य कब पूरा करूँगा। परेशान न्यायाधीश महोदय ने सभी प्रयास कर लिये, मगर कोई हल नहीं निकला। आखिरकार उन्होंने मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है। 

मां कुल 30 किलो की बेहद कमजोर सी औरत थी और बड़ी मुश्किल से व्हील चेयर पर आई थी। उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान  बराबर हैं। मैं किसी एक के पक्ष में फैसला सुनाकर, दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती। आप न्यायाधीश हैं, निर्णय करना आपका काम है। जो आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी। 

आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से  निर्णय दिया कि न्यायालय छोटे भाई की भावनाओं से  सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है| ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है। फैसला सुनकर बड़ा भाई जोर जोर से रोने लगा कि इस बुढापे ने मेरे स्वर्ग को मुझसे छीन लिया। अदालत में मौजूद  न्यायाधीश समेत सभी रोने लगे। 

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो, तो इस स्तर का हो। ये क्या बात है कि 'माँ तेरी है' की लड़ाई हो, और पता चले कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं यह पाप है। हमें इस मुकदमे से ये सबक लेना ही चाहिए कि जीवन मे कभी अपने माता-पिता का दिल दुखाना नही चाहिए। 

आप सभी से निवेदन है दुनिया के हर एक घर में माँ-बाप को मान-सम्मान, सुख, प्यार, इज्जत व सब कुछ मिले, जिसके वो हक़दार है। अगर वो ही नहीं होते तो हम कहाँ से आते।
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